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Thursday, March 15, 2012

खोखली हँसी

पुरानी तसवीरें देखता हूँ
सोच में डूब जाता हूँ
उन हँसते हुए चेहरों को 
आसपास ढूंढता हूँ
कुछ चेहरे नहीं दिखते
काल के गाल में समा गए
पर अधिकतर दिख जाते
चेहरे वही पर अब चिंताग्रस्त
झुर्रियां लिए हुए 
ह्रदय में बुढापे का दर्द छुपाये
खोखली हंसी से मेरा 
स्वागत करते हैं
मानों मेरा मज़ाक उड़ा 
रहे हैं
मुझ से चीख चीख कर 
कह रहे हैं 
हमें क्या देखते हो
अपने चेहरे को भी शीशे 
में देखो
तुम्हारा चेहरा भी
हमारे चेहरे जैसा ही 
दिखता है
बुढापे का चेहरा
कल क्या होगा ?
के सोच में डूबा हुआ
आज की पीड़ा से ग्रस्त
सम्मान ,भाईचारे,अपनत्व को
तलाशता हुआ
उसे पता ही नहीं है
अब इनकी आशा करना 
व्यर्थ है
जितना भी मिल रहा है
उसी में संतुष्ट रहो
जैसा भी जीवन मिले जी लो
अधिक की आशा करोगे
समय से पहले चले जाओगे
जब तक जीवित हो
खोखली हँसी ही हँस लो 
15-03-2012
380-114-03-12