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Monday, March 5, 2012

मेरे अन्दर का राक्षस

मेरे अन्दर का राक्षस
मुझे उकसाता है
मुझे प्रेरित करता है
प्रलोभन देता है
ताने देता है
मेरी हंसी उडाता है
निरंतर कहता है
क्यों सहते हो सब?
क्यों व्यथित होते हो?
उतर जाओ तुम भी
उनके स्तर पर
वो मेरे अनुयायी हैं
तुम भी बन जाओ
वो कितना आगे बढ़ गए
धनवान और बलशाली
हो गए
तुम भी उनके जैसे ही
सामर्थ्य वाले बन जाओ
उनके जैसे मन में
इर्ष्या द्वेष रखो
नित्य लोगों का बुरा करो
भ्रष्ट आचरण करो
येन केन प्रकारेण
धन कमाओ
मान मर्यादाओं को
भूल जाओ
मन डोलने लगता है
तभी परमात्मा पर मेरी
आस्था और अडिग
विश्वास
बीच में आ जाता है
मेरे सोच को बदलने
नहीं देता
मेरे अन्दर के राक्षस को
दूर भगाता है
मुझे सत्य,ईमान के
पथ से
डिगने नहीं देता
05-03-2012
296-31-03-12