बार बार हमारे
करीब आते हो तुम
हर बार मिल कर
बिछड़ जाते हो तुम
ना तुम हमें जानते
ना हम तुम्हें जानते
फिर भी बार बार
क्यों मिलते हैं हम
खुद भी सज़ा पाते हो
हमें भी
सजा देते हो तुम
ये कैसा साथ
निभाते हो तुम
15-03-2012
373-107-03-12
निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )
जो रोज़ मिलते
ऊपर से खुश दिखते
अन्दर से बद्दुआ देते
मेरे अनजाने ब्लॉगर
दोस्त उनसे अच्छे
जिन्हें कभी देखा नहीं
जो कभी मिले नहीं
वो मेरा मैं उनका
होंसला बढाते
जो मैं लिखता
वो पढ़ते
जो वो लिखते,
मैं पढता
वो दाद देते ,
मैं भी दाद देता
उनसे मिलने की
इच्छा रखता
देखने को दिल चाहता
उनका भी सोच
ऐसा ही होगा
इस उम्मीद में निरंतर
लिखता रहता
31-07-2011
1274-158-07-11