मेरे अखलाक का
तकाजा नहीं कहता
की घर आये को
लौटाऊँ
वो दुश्मन ही क्यूँ
ना हो
उसे गले से ना
लगाऊँ
मेहमाँ हो
दिल रोशन जिस से
उस शमा को
को कैसे भूल जाऊँ?
निरंतर हर लम्हा
जिया तुम्हारे खातिर
तुम्हें भूल कर
मौत को गले कैसे
लगाऊँ?
(अखलाक=सदभावना,सदाचार)
22-09-2011
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