Monday, August 13, 2012

गुनाह की सज़ा



बहुत अरसे के बाद
उनका ख़त आया
हमने समझा उनका
घमंड चूर हो गया
नफरत छोड़
अब क्यूं उन्हें
मोहब्बत का ख्याल आया?
ख़त खोला तो उसमें
लिखा था
हमारा हर ख़त ज़ला कर
राख कर देना
साथ बिताया हर लम्हा
भूल जाना
जुबां से हमारा नाम तक
ना लेना
तुम पर शक कर
हमने जो गुनाह किया
उसकी सज़ा खुद को दे रहे हैं
साथ में उनके भाई का
ख़त भी था
जिसमें लिखा था
ख़त खुदकशी के बाद
बहन की
लाश के पास मिला था
13-08-2012
658-18-08-12

तेरी यादों में डूबा हुआ



तेरी यादों में डूबा हुआ
समंदर किनारे बैठा हूँ
आती जाती लहरों को
देख रहा हूँ
कैसे मंजिल को छू कर
समंदर से मिलने से पहले
लहरें
अपना निशाँ छोड़ जाती हैं
क्यूं तुम ऐसा नहीं करती ?
माना की मंजिल
बदल चुकी तुम्हारी
फिर भी
इतना तो याद होगा तुम्हें
कभी मैं ही था मांझी
किश्ती का तुम्हारी
मेरे रकीब से मिलने से पहले
मुझसे मिल कर लौट जाना
तुम्हारे छोड़े हुए निशानों
के सहारे ही उम्र गुजार दूंगा
13-08-2012
657-17-08-12

ज़िन्दगी को समझने के लिए


ज़िन्दगी को
समझने के लिए
खुशी के साथ गम भी
ज़रूरी है
हँसी के साथ आंसू भी
ज़रूरी है
जीत के साथ हार भी
ज़रूरी है
क्रोध के साथ प्यार भी
ज़रूरी है
हर जान को
एक जान का साथ भी
ज़रूरी है
इंसान बन कर रहना भी
ज़रूरी है
ऊपर वाले की दुआ भी
ज़रूरी है
जिसने भी समझ लिया
सच ज़िन्दगी का
उसने ही समझ लिया
ज़िन्दगी को
उसको फ़िक्र करना फिर
ज़रूरी नहीं है
13-08-2012
656-16-08-12

चिंतन ,मनन के बाद !



रात भर सो नहीं पाया
विचारों से व्यथित होता रहा
किसी तरह आँख लगी ही थी
कानों में चिड़ियों की
चहचाहट सुनायी पड़ने लगी
सवेरे का उजाला ,
धूप की किरनें
मेरे कमरे में आने लगी
मेरे पास दो ही उपाय हैं
करने के लिए
या तो खिड़कियाँ खोल दूं
पर्दों को पूरी तरह हटा दूं
कमरे को ताज़ी हवा,
भरपूर उजाले से भर दूं
खुद भी प्रफुल्लित,
उल्लासित महसूस करूँ,
मन की चिंता भूल कर
अपने काम पर चल पडूँ
या फिर पर्दों को पूरी तरह
खींच दूं ,
उजाले और हवा को
कमरे में आने ही ना दूं
चादरओढ़ कर,आँख बंद कर
फिर अँधेरे में लौट जाऊं
खुद को व्यथित करूँ ?
मन की पीड़ा को बढाऊँ?
चिंतन मनन के बाद
निश्चित कर लिया
अवसाद के झंझावत में
नहीं फसूँगा
फल मिले ना मिले
कर्म करता रहूँगा,
हर्षोल्लास पाने का
प्रयत्न नहीं छोडूंगा
13-08-2012
655-15-08-12




Sunday, August 5, 2012

क्या ज़माने का दस्तूर निभाते हो तुम ?



किस बात से
घबराते हो तुम
क्यूं इतना
खौफ खाते हो तुम
मुस्कारा कर मिले थे
दिल से दिल मिलाया
मन से मन मिलाया
अब पहचानते तक
नहीं हो
वो तो चाहत का
सौदा था
ये हक तो नहीं दिया था
मेरे ज़ज्बातों से खेलो
क्या ज़माने का दस्तूर
निभाते हो तुम ?
05-08-2012
654-14-08-12

वो छोटी बहन मेरी,मैं भाई उसका



बड़ा ही
नटखट अंदाज़ उसका
पल में
रूठना पल में हँसना
स्वभाव उसका
कभी छेड़ना कभी
नाराज़ होना
कभी गुस्से में मुंह
फुलाना
पता ही नहीं चलता
कब बरसेगी ?कब हँसेगी?
उसका रंग बिरंगा
सावन भादों सा व्यवहार
मुझ को बहुत भाता
जब चिड कर
उसके सतरंगी व्यवहार पर
उसको उल्हाना देता
पलट कर कह देती
मैं ऐसी हूँ,ऐसी ही रहूँगी
मेरी चिढ ख़त्म हो जाती
मैं भी कह देता
ऐसी ही अच्छी हो
ऐसी ही चटपटी रहना
सब को खुश रखना
यूँ ही मन को लुभाना
वो छोटी बहन मेरी
मैं भाई उसका
05-08-2012
653-13-08-12

पवित्र रिश्ते को केवल धागे से मत जोड़ो



पवित्र रिश्ते को केवल
धागे से मत जोड़ो
थोड़ा सा आगे बढ़ो
त्योंहार के पहले ही
त्योंहार मनाओ
हर दिन को रक्षाबंधन
समझो
जिससे रिश्ता नहीं कोई
उसे भी बहन कह दो
निरंतर उसकी रक्षा का
प्रण कर लो
तुमसे मांगे मदद
उससे पहले ही
आवश्यकता पूछ लो
पवित्र रिश्ते को नाम
ना दो
उसे स्नेह विश्वास से
जी लो
05-08-2012
652-12-08-12

अपनों ने इतना सताया उनको



कभी मिले भी नहीं
फिर  भी डरते हैं हमसे
क्यूं देख कर भी
अनदेखा करते हैं
हम कभी समझे नहीं
शायद अपनों ने
इतना सताया उनको
किसी अनजान पर
ऐतबार नहीं कर पाते
हर चेहरे पर दाग
दिखते हैं
कैसे यकीन दिलाएं
हम हज़ारों मील दूर
बैठे हैं
चाहें तो भी उनके करीब
भी नहीं पहुँच सकते
05-08-2012
651-11-08-12

कभी इंसान बन कर भी जिया करो



मेरे सीधेपन का मखौल
ना उडाओ
मेरे तीखेपन को ना
उकसाओ
अभी तक तो सीखा नहीं
किसी का मज़ाक उड़ाना
अब कोई चाहत भी नहीं
उसे सीखने की
फिर भी अगर मजबूर
करोगे
हम मुस्कारा कर सिर्फ
इतना कहेंगे
ऐ दोस्त कभी इंसान
बन कर भी जिया करो
इंसान को
इंसान समझा करो
05-08-2012
650-10-08-12

Friday, August 3, 2012

ना तुम्हारी जीत ज़रूरी ,ना मेरी हार ज़रूरी



ना तुम्हारी जीत ज़रूरी
ना मेरी हार ज़रूरी
दिलों में नज़दीकी ज़रूरी
मैं हार भी जाऊं
पर दिल से नहीं लगाऊँ
तुम जीत भी जाओ
गर सर पर ना चढाओ
अहम् से ना भर जाओ
दिल आपस में वैसे ही
मिलते रहेंगे
ना इक दूजे से यकीन
उठेगा
ना दिलों में फासला बढेगा
मुझे हार में भी जीत का
मज़ा मिलेगा
तुम जीत कर भी
दिल हार जाओगे
03-08-2012
649-09-08-12

एक प्रश्न ने सदा से कचोटा मन को


रक्षाबंधन के त्योंहार पर
एक प्रश्न ने सदा से
कचोटा मन को
क्यों भाई बहन को
स्नेह के साथ
कुछ पैसे भी देता
क्यों नहीं भाई इसे अपनी
आदत ही बना लेता
त्योंहार बिना ही बहन की
आवश्यकताओं का
ख्याल रखता
बहन भी
ज़रूरतमंद भाई की
ऐसे ही मदद करती
रहती
पवित्र रिश्ते को
प्रघाढता और नयी
दिशा मिलती
03-08-2012
648-08-08-12

ज़िन्दगी में बस एक ही गिला मुझे



ज़िन्दगी में बस
एक ही गिला मुझे
जिससे मुझे नहीं गिला
उसे गिला मुझसे
यूँ तो मिले  सफ़र में
लोग बहुत मुझे
अब तक कोई ना मिला
जो समझ सके मुझ को
हर शख्श को चाहिए था
कुछ ना कुछ
जिसे मिल गया
वो अब भी साथ मेरे
जिसे नहीं दे सका
उसके मन का
वो ही अब दुश्मन मेरा
03-08-2012
647-07-08-12

वो भाई बहन का रिश्ता ही क्या?



वो भाई बहन का
रिश्ता ही क्या?
जिसमें
लड़ना झगड़ना ना हो
रूठना मनाना ना हो
साथ हंसना रोना ना हो
एक दूजे का ख्याल
आता ना हो
मिले बिना चैन
आता हो
दूर रहो या पास
एक दूजे के बिना
मन खुश रहता हो
प्रेम का
धागा बांधो ना बांधो
हर पल
दुआ निकलती ना हो
03-08-2012
646-06-08-12

हम तो गिर कर उठते रहे हैं



जिस को भी
चलनी है जो भी चाल
चल ले वो
जितनी भी नफरत
रखनी है रख ले वो
जितना भी बदलना चाहे
बदल जाए वो
हमें तो आदत है
दोस्तों को दुश्मन बनते
देखने की
कोई कितनी भी कोशिश
कर ले
हमें नेस्तनाबूद करने की
हम तो गिर कर उठते रहे हैं
फिर उठ जायेंगे
उनका क्या होगा
जिन्हें आदत सिर्फ
गिराने की
इतना थक जायेंगे
हम को बार बार
गिराने की कोशिश में
खुद गिर गए एक बार भी
तो फिर उठ ना पायेंगे
03-08-2012
645-05-08-12

हम ही बर्दाश्त नहीं कर पाते खुशी खुद की


अब बहारों को भी
खामोश निगाहों से
देखते हैं हम
खुश होकर भी
ज़ाहिर नहीं करते हैं
खौफज़दा हैं
फिर ना लग जाए
हमारी ही
नज़र हम को ही
किसी और पर क्यूं
इलज़ाम लगाएँ
जब हम ही बर्दाश्त
नहीं कर पाते खुशी
खुद की
03-08-2012
644-04-08-12


कितनी ज़ज्बाती थी बोतल



यूँ ही सागर किनारे
टहलते टहलते ,
मिली इक बोतल अनायास
छुपा रखा था
अपने दामन में उसने
इज़हार-ऐ-मोहब्बत के
लब्जों से
भरा एक ख़त
ज़हन में ख्याल आया
कितनी
ज़ज्बाती  थी बोतल
खुद मय की बेवफाई
भुगत रही थी
जो किसी और के हलक में
उतर चुकी थी
गम में डूबी थी
बोतल खुद
समंदर के पानी में
डूबकियां लगाती रही
मगर  दूसरों के प्यार को
सीने से लगाती रही
कितनी
ज़ज्बाती थी बोतल
खुद लुट गयी
दूजे को लुटते नहीं देखना
चाहती थी
03-08-2012
643-03-08-12

मन का रिश्ता



घर से बाहर निकलते ही
एक लावारिस कुत्ता
मेरे पास आया
पूछ हिलाकर अभिवादन
करने लगा
मैंने भी उसे स्नेह से
पुचकार लिया
तीन वर्ष तक यही क्रम
निरंतर चलता रहा
समय एक साथ
हमारे बीच एक
अजीब सा रिश्ता हो गया
 वह घर के बाहर मेरा
 इंतज़ार करता
किसी दिन वह नहीं
दिखता
तो मन व्याकुल होने
 लगता
 उसकी प्रतीक्षा करता
ना उसे मुझ से
 ना ही मुझे उससे कोई 
आशा थी
हमारे मन का रिश्ता
दिन प्रतिदिन
प्रघाढ होता गया
सांयकाल दफ्तर से
घर लौटते  समय भी
मिलना आवश्यक हो गया 
अचानक
समय ने पलटा खाया
उसका दिखना बंद हो गया
कई दिन
व्याकुल व्यथित रहा
फिर भी उसे भूल ना पाया
पर एक प्रश्न ने
मन में जन्म अवश्य दे दिया
क्यों इंसान हर रिश्ते को
नाम देता
रिश्तों में मंतव्य ढूंढता
उन्हें शक से देखता
जब भी उस लावारिस
कुत्ते की याद आती है
आँखें नम हो जाती हैं
इंसानी रिश्तों की स्थिती
देख कर
मन में अजीब सी टीस
उठने लगती है
03-08-2012
642-02-08-12

महसूस न हो उन्हें कभी,कोई भाई नहीं उनके



बहन से
राखी बंधवा कर
मत समझ लो
भाई की जिम्मेदारी
पूरी हो गयी
जिसने नहीं बाँधी राखी
जिसका नहीं कोई भाई
उसको भी बहन मान लो
भले ही राखी ना
बन्धवाओ
पर भाई का फ़र्ज़
निभाओ
ऐसा अहसास कराओ
महसूस न हो उन्हें कभी
कोई भाई नहीं उनके
बड़े गर्व से कह सकें
सैकड़ों भाई हैं उनके
03-08-2012
641-01-08-12

Tuesday, July 31, 2012

हम खुद में इतने पागल हैं



हम खुद में इतने
पागल हैं
अपनों को दुश्मन
समझते हैं
ज़हर को अमृत समझ
कर पीते हैं
खुशहाली हमको
पसंद नहीं
बदनामी का डर नहीं
खुद के हाथों से खुद
आग लगाते हैं
खुद बेचैन रहते हैं
दूजे का
चैन भी छीनते हैं
ना खुद सो पाते हैं
ना दूजों को सोने देते हैं
हँसती गाती ज़िन्दगी को
आंसूओं से भर देते हैं
हम खुद में इतने
पागल हैं
31-07-2012
640-37-07-12