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Monday, April 2, 2012

ये कैसी चाहत है ?



तुम कहते हो
हमें बहुत चाहते हो
हर पल याद करते हो
ये कैसी चाहत है ?
हमारे चेहरे पर दर्द की
लकीरें
तुम ठहाके लगा रहे हो
हम चल भी नहीं  सकते
तुम दौड़ लगाते हो
क्यों खामखाँ
दोस्ती का नाम बदनाम
करते हो
इससे तो बेहतर था
तुम खुले आम हमें
दुश्मन कहते
दिल में  झूठ बोलने का
बोझ तो नहीं ढोते
अपने ज़मीर से तो
इमानदारी करते
02-04-2012
424-04-04-12

Saturday, February 25, 2012

जब जहर पीते रहना है,घुट घुट कर जीना है

कुछ करूंगा तो भी
तोहमत लगेगी
ना करूंगा तो भी
तोहमत लगेगी
हर बार गुनाहगार
कहलाऊंगा
खुद को सवालों से
घिरा पाऊंगा
बार बार बेगुनाही
साबित करनी पड़ेगी
जब
जहर पीते रहना है
घुट घुट कर जीना है
तो क्यों परवाह करूँ
लोगों की
जिस को जो भी
समझना है समझ ले
जो भी मानना है
मान ले
ना हारा कभी
ना अब हारूंगा
करूंगा वही जो मेरा
ईमान कहता है
मेरा ज़मीर मेरे साथ है
मेरा खुदा मेरे साथ है

25-02-2012
239-150-02-12