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Tuesday, March 13, 2012

जीवन एक विशालकाय कैनवास

जीवन
एक विशालकाय
कैनवास से कम नहीं 
चित्रकार परमात्मा का
अमिट सृजन
सुख दुःख,हँसी खुशी,
विपदा,विलाप,दया,क्रोध
प्यार,इर्ष्या द्वेष,
विश्वास और ममता के
रंगों से भरा चित्र
परमात्मा ने बड़े
मनोयोग से
विभिन्न रंगों को अपनी
कूंची से सजाया है
किस का जीवन किस रंग से
भरा जाएगा
सिवाय उसके कोई नहीं
जानता
परमात्मा किस पात्र का
रंग कब बदल देगा
ये भी वही जानता
कैनवास वही रहेगा पात्र
बदलते रहते
किस का स्थान कब तक
निश्चित है
एक पहेली से कम नहीं
मन सोचता
कहीं संसार इश्वर के
खेल का मैदान तो नहीं
समस्त प्राणी उसके खिलाड़ी
प्रकृती उसका स्टेडियम
आकाश,दर्शक दीर्घा
जहां से बैठ कर 
परमात्मा खेल देखता
पात्र बदलता रहता
13-03-2012
354-88-03-12

Saturday, March 3, 2012

अब बचा नहीं कुछ बताने को

लुटा चुका सब
कुछ बचा नहीं
अब लुटाने को
इतना कुछ देख लिया
बचा नहीं अब
कुछ और देखने को
इतना रो लिया अब तक
मन नहीं करता
अब हँसने का
जी रहा हूँ किस तरह
अब बचा नहीं कुछ
बताने को
सुकून क्या होता है
भूल गया हूँ
समझता हूँ  सुकून
अब चुप रहने को
03-03-2012
287-22-03-12