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Sunday, September 11, 2011

ज़िन्दगी बहुत कुछ सहती रहती

छोर नहीं दिखता
जिसका
ज़िन्दगी उस सागर सी
नज़र आती
निरंतर कभी ज्वार
कभी भाटा जीवन में
आता रहता
कभी खामोश कभी
क्रोध से उफनता
भावनाओं की लहरें
कभी छू कर चली जाती
कभी मन मष्तिष्क को
सरोबार करती
मन की गहराइयों  में
पीड़ा और प्यार की
जुगलबंदी
बनती बिगडती  रहती
बिना शोर मचाये
सागर सी रहस्मय
ज़िन्दगी बहुत कुछ
सहती रहती
11-09-2011
1485-57-09-11