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Wednesday, November 28, 2012

पीड़ित मन



पीड़ित मन से
रोते रोते अचानक
ख्याल आ गया
रोने से किसी को नहीं मिला
तो मुझे कैसे मिलेगा
मन की व्यथा कम करनी है
तो क्यों ना
किसी अपने से बात कर लूं
जो मन को पसंद हो
वो काम कर लूं
अच्छा संगीत सुन लूं
अच्छी किताब पढ़ लूं
मन को हल्का कर लूं
अपने को व्यवस्थित कर लूं
फिर से काम में जुट जाऊं
फिर कभी व्यथित ना होऊँ
ऐसा सोच रख लूं
जो होना है वो हो कर रहेगा
रोने से किसी को नहीं मिला
तो फिर मुझे कैसे मिलेगा
880-64-28-11-2012
व्यथा,व्यथित,मन,पीड़ा,जीवन

Saturday, September 17, 2011

किसे व्यथा ह्रदय की सुनाऊ ? कैसे पीड़ा मन की बताऊँ ?

किसे व्यथा
ह्रदय की सुनाऊ
?
कैसे पीड़ा

मन की बताऊँ
?
कौन मेरी मानेगा
?
कौन विश्वाश करेगा
?
जब अपने ही

पराया समझने लगे

निरंतर
आरोप मुझ पर
लगाने लगे

किसी और से आशा

क्या करूँ
?
अब दोस्त दुश्मन

एक हो गए

पल पल वार कर रहे

कैसे अपने को
बचाऊँ ?
किसे व्यथा

ह्रदय की सुनाऊ
?
कैसे पीड़ा

मन की बताऊँ
?
17-09-2011
1517-88-09-11

Sunday, September 11, 2011

ज़िन्दगी बहुत कुछ सहती रहती

छोर नहीं दिखता
जिसका
ज़िन्दगी उस सागर सी
नज़र आती
निरंतर कभी ज्वार
कभी भाटा जीवन में
आता रहता
कभी खामोश कभी
क्रोध से उफनता
भावनाओं की लहरें
कभी छू कर चली जाती
कभी मन मष्तिष्क को
सरोबार करती
मन की गहराइयों  में
पीड़ा और प्यार की
जुगलबंदी
बनती बिगडती  रहती
बिना शोर मचाये
सागर सी रहस्मय
ज़िन्दगी बहुत कुछ
सहती रहती
11-09-2011
1485-57-09-11

Tuesday, August 9, 2011

मन की पीड़ा मन में नहीं रहती

मन कितना भी

कठोर कर लो

चाहे जितना

खुद को समझा लो

मन की पीड़ा

निरंतर

मन में नहीं रहती

बाहर आ ही जाती

लाख छिपाओ

छुप नहीं पाती

कभी आँखों से अश्क

बन कर बहती

निरंतर

चेहरे पर झलकती

कभी जुबां से

निकलती

कभी कलम के ज़रिये

जग को पता

पड़ती

मन की पीड़ा मन में

नहीं रहती

09-08-2011

1322-44-08-11