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Friday, March 2, 2012

बसंत के आगमन पर


बसंत के आगमन पर
उस की पीली चुनडी
मेरे मन को ढक लेती है
मैं आँखें बंद कर
बसन्ती
बयार में खो जाता हूँ
बसंत बहार की मादक सुगंध
मेरे मस्तिष्क को
अप्सराओं के संसार में
विचरण कराने लगती
बसन्ती दोपहर में नर्म धूप
ह्रदय में प्यार की गर्माहट को
जन्म देती है
मैं अपनी सुधबुध खो देता हूँ
ऐसा लगने लगता मैं
मैं नहीं हूँ
साक्षात बसंत हूँ
जो धरती पर
महक और खुशियाँ फैलाने
युवा ह्रदयों में प्यार जगाने
उनकी धड़कन बढाने
आया हूँ
उनके बुझे चेहरों को
मुस्काराहट से सजाने
आया हूँ
02-03-2012
272-07-03-12

Monday, July 4, 2011

ऋतु बसंत की आयी ,बहार फूलों की लायी

ऋतु बसंत की आयी
बहार फूलों की लायी
चेहरों पर खुशी छायी
कोयल की कूंक गूंजे
पपीहा पीहू पीहू बोले
भँवरे निरंतर गीत गायें
फूलों पर आँख गढ़ाए
गुंजन से उन्हें लुभाए
प्रेम रस से ह्रदय भीगे
प्रेमी जोड़ों के मन डोले
पेड़ों में नए पत्ते आये
हरयाली पंछियों को बुलाये
मौसम ने अंगडायी ली
शीत की विदाई हुयी
हवा में गर्मी आयी
रंगों की बरसात हुयी
होली पर मस्ती छाई
साजों की जाजम बिछी
संगीत गोष्ठी सजने लगी
गीतों की स्वर-लहरी गूंजी
ऋतु बसंत की आयी
जीवन में आशाएं लायी
04-07-2011
1131-15-07-11