Showing posts with label लाचारी. Show all posts
Showing posts with label लाचारी. Show all posts

Tuesday, August 21, 2012

बुढापे पर कविता -जब उम्र का बोझ बढ़ जाए



जब उम्र का
बोझ बढ़ जाए
लाचारी जीवन का
सच बन जाए
मजबूरी में जीना
पड़ता है
कदम कदम पर
समझौता करना
पड़ता है
बाप को बेटा बन कर
रहना पड़ता है
फिर भी हँसते हुए
दिखना होता है
बहुत खुश हूँ
कहना पड़ता है
21-08-2012
672-32-08-12,

Saturday, March 17, 2012

लाचारी में


एक जोर की
किलकारी गूंजी
एक जान ने धरती पर
आँखें खोली
सड़क किनारे लेटी
माँ की आँखें खुशी से
नम हो गयी
अगले ही पल
खुशी हवा हो गयी
सोचने लगी
नन्ही सी जान को
कैसे खिलायेगी,पिलाएगी
अपना पेट भरना 
ही कठिन
इसकी भूख कैसे मिटाएगी
कैसे हवस के भूखे
भेड़ियों से
इसकी अस्मत बचायेगी
विचारों ने पथ
चेहरे ने रंगत बदली
लाचारी में खुद से 
कहने लगी
जो होगा देखा जाएगा
जैसे मैं अब तक जी 
रही हूँ
वैसे ही ये भी जी लेगी
जो भी इसकी
किस्मत में लिखा होगा
भुगत लेगी
अभी तो इसका पेट
भर दूं
जो मेरे हाथ में है वो
तो कर दूं
फिर उसे दूध पिलाने
लगी
17-03-2012
392-126-03-12

Tuesday, August 16, 2011

हसरतें दिल में दबा कर रखता हूँ

कभी

मैं भी चहकता था

खुल कर बहकता था

निरंतर पंछी सा

उड़ता था

अब कायदे के

पिंजरे में बंद हूँ

कम बोलता हूँ

खामोशी से सहता हूँ

हसरतें दिल में

दबा कर रखता हूँ

लाचारी से देखता हूँ

यादों के सहारे

जीता हूँ

16-08-2011

1367-89-08-11

Thursday, July 7, 2011

लाचारी

कल रात फिर
कोई सौ का नोट
दे गया
बेटी को साथ
ले गया
अंधा,अपाहिज था
खून खौलता रहा
पेट के खातिर
चुप रहा
रात भर रोता रहा
जान देना चाहता था
बेटी के खातिर
खामोशी से सहता
रहता
उसकी गरीबी
और लाचारी का
मज़ाक उड़ता रहता
बेटी निरंतर बाप के
खातिर
शरीर बेचती रहती
हवस का शिकार
होती रहती
मर मर कर
जीती रहती

जीने की तमन्ना
दोनों को मरने
नहीं देती  
06-07-2011
1146-30-07-11