जब उम्र का
बोझ बढ़ जाए
लाचारी जीवन
का
सच बन जाए
मजबूरी में
जीना
पड़ता है
कदम कदम पर
समझौता करना
पड़ता है
बाप को बेटा
बन कर
रहना पड़ता है
फिर भी हँसते
हुए
दिखना होता
है
बहुत खुश हूँ
कहना पड़ता है
21-08-2012
672-32-08-12,
एक जोर की
किलकारी गूंजी
एक जान ने धरती पर
आँखें खोली
सड़क किनारे लेटी
माँ की आँखें खुशी से
नम हो गयी
अगले ही पल
खुशी हवा हो गयी
सोचने लगी
नन्ही सी जान को
कैसे खिलायेगी,पिलाएगी
अपना पेट भरना
ही कठिन
इसकी भूख कैसे मिटाएगी
कैसे हवस के भूखे
भेड़ियों से
इसकी अस्मत बचायेगी
विचारों ने पथ
चेहरे ने रंगत बदली
लाचारी में खुद से
कहने लगी
जो होगा देखा जाएगा
जैसे मैं अब तक जी
रही हूँ
वैसे ही ये भी जी लेगी
जो भी इसकी
किस्मत में लिखा होगा
भुगत लेगी
अभी तो इसका पेट
भर दूं
जो मेरे हाथ में है वो
तो कर दूं
फिर उसे दूध पिलाने
लगी
17-03-2012
392-126-03-12
कभी
मैं भी चहकता था
खुल कर बहकता था
निरंतर पंछी सा
उड़ता था
अब कायदे के
पिंजरे में बंद हूँ
कम बोलता हूँ
खामोशी से सहता हूँ
हसरतें दिल में
दबा कर रखता हूँ
लाचारी से देखता हूँ
यादों के सहारे
जीता हूँ
16-08-2011
1367-89-08-11
कल रात फिर
कोई सौ का नोट
दे गया
बेटी को साथ
ले गया
अंधा,अपाहिज था
खून खौलता रहा
पेट के खातिर
चुप रहा
रात भर रोता रहा
जान देना चाहता था
बेटी के खातिर
खामोशी से सहता
रहता
उसकी गरीबी
और लाचारी का
मज़ाक उड़ता रहता
बेटी निरंतर बाप के
खातिर
शरीर बेचती रहती
हवस का शिकार
होती रहती
मर मर कर
जीती रहती
जीने की तमन्ना
दोनों को मरने
नहीं देती
06-07-2011
1146-30-07-11