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Wednesday, November 28, 2012

आराम से सोये तो तीन आ जाएँ , कसमसाकर सोना हो तो चार (व्यंग्य)



आराम से सोये
तो तीन आ जाएँ
कसमसाकर सोना हो तो चार
ठूंस ठांस कर सोना हो तो पांच
पर गरीब की झोंपड़ी थी
आजादी से आज तक
उतनी ही है
चार पांच हाड मांस के पुतले
उसमें ज़िंदा रहते
कोई रात भर खांसता,
कोई जुखाम में नाक
सुकुड़ता रहता
बाकी बचे लोग ना रुकने वाली
आवाजों के कारण जागते रहते
सवेरे अधसोए अधजगे उठते
पेट भरने के लिए
काम पर निकल पड़ते
रात को थक चूर कर
पहले से अधिक कमज़ोर लौटते
इसी झोंपड़ी में एक से दो हुए
फिर दो से तीन,चार,पांच हुए
कुछ साल में
कभी एक कम हो जाता
तो कभी एक नया जुड़ जाता
झोंपड़ी में
आजादी के बाद बिजली का
एक मरियल सा लट्टू
अवश्य लटक गया
जिसने रात के अँधेरे को तो
कम कर दिया
पर ज़िन्दगी के अँधेरे को
कम ना कर सका
ज़िन्दगी आजादी के पहले भी
लडखडाती थी
लूले लंगड़े प्रजातंत्र में
आज भी लडखडा रही है
देश में और कुछ
बदला ना बदला हो
गरीब की झोंपड़ी नहीं बदली
ऐतहासिक धरोहर सी
अब भी आजादी से पहले की
याद दिलाती है
869-53-28-11-2012
व्यंग्य,आजादी,देश,गरीबी,भुखमरी,प्रजातंत्र

Friday, September 7, 2012

अपना पेट तो मैं भी भर लेता हूँ



एक दस साल के बच्चे को
ढाबे पर
बर्तन मांजते देखा
मन दुखी हुआ
उससे पूछ लिया
तुम इतनी छोटी उम्र में
पढ़ते क्यों नहीं
काम क्यों करते हो
उसके जवाब ने मुझे
निरुत्तर कर दिया
कहने लगा
बाबूजी आपने पढ़ कर
क्या पा लिया
अपना पेट भरने के सिवाय
कितने भूखों का पेट भर दिया
कितने बच्चों को स्कूल
पढने भेज दिया
केवल बातें बनाना ही
तो सीखा है
वो तो मैं भी कर लेता हूँ
अपना पेट तो मैं भी
भर लेता हूँ
07-09-2012
726-22-09-12

Sunday, August 26, 2012

देश आज़ाद है



बाप खदान में
पत्थर तोड़ता
माँ भट्टे पर मिट्टी
उठाती
फटे कपड़ों में बच्चा
कचरे के ढेर से थैलियाँ
बीनता
सुख की बात ही कहाँ ?
परिवार बामुश्किल
जीवित रहने के लिए
कड़ी धूप में झुलसता
एक दिन निकलता
शरीर पहले से अधिक
काला और कमज़ोर पड़ता
फिर भी बाप
छोटी सी खोली में
जिसका महीने का किराया
पत्नी के महीने भर की
मेहनत को लील लेता
प्रसन्नता से भगवान् को
धन्यवाद देता
कल का दिन निकल जाए
पेट भर जाए
मन से प्रार्थना करता
रात भर खांसता रहता
मकान,गाडी,का सपना
देखने का भी समय नहीं
मिलता
अभी ज़ल्दी भी कहाँ है
पेट की अग्नि बुझाने की
पक्की व्यवस्था हो जाए
तो वो भी देख लेगा
बातों में निरंतर सुनता
देश आज़ाद है
जनता की सरकार है
पर उसे
कोई फर्क नहीं पड़ता
उसे आजादी से
पहले और आज में
कोई फर्क नहीं लगता
जो अपने माँ बाप को
करते देखता था
वो भी वही कर रहा
26-08-2012
696-56-08-12

Thursday, May 10, 2012

मेरी आँखों ने जो देखा



पैसा,सत्ता, ताकत ही
सब कुछ है
इमानदारी बकवास
लूट खसोट करना
भ्रष्ट होना सबसे उत्तम  है 
ना यह सत्य है
ना ही भावनाओं का
उबाल
ना मस्तिष्क की उपज
ना ही ह्रदय की आवाज़
ये केवल
मेरी आँखों ने जो देखा
मेरे कानों ने जो सुना
मेरे शहर में
फुटपाथ पर लेटे
भूख से मर रहे
एक गरीब असहाय ने
आंसू बहाते हुए 
जो कहा
उसका वर्णन है
08-05-2012
504-19-05-12

Saturday, March 17, 2012

लाचारी में


एक जोर की
किलकारी गूंजी
एक जान ने धरती पर
आँखें खोली
सड़क किनारे लेटी
माँ की आँखें खुशी से
नम हो गयी
अगले ही पल
खुशी हवा हो गयी
सोचने लगी
नन्ही सी जान को
कैसे खिलायेगी,पिलाएगी
अपना पेट भरना 
ही कठिन
इसकी भूख कैसे मिटाएगी
कैसे हवस के भूखे
भेड़ियों से
इसकी अस्मत बचायेगी
विचारों ने पथ
चेहरे ने रंगत बदली
लाचारी में खुद से 
कहने लगी
जो होगा देखा जाएगा
जैसे मैं अब तक जी 
रही हूँ
वैसे ही ये भी जी लेगी
जो भी इसकी
किस्मत में लिखा होगा
भुगत लेगी
अभी तो इसका पेट
भर दूं
जो मेरे हाथ में है वो
तो कर दूं
फिर उसे दूध पिलाने
लगी
17-03-2012
392-126-03-12

Monday, October 3, 2011

गरीबी का मूल्य

नन्हे
हाथों में नए कंगन,
कानों में झुमके
गले में मोतियों की
माला पहने
नयी चुनडी ओढ़े
उछलते कूदते
नन्ही बालिका इतरा
रही थी
घर आये मेहमानों को
बड़े गर्व से अपने नए
वस्त्राभूषण दिखा
रही थी
उसे पता नहीं था
आज उसके बचपन का
अंतिम दिन था
कल उसका विवाह था
उसके कौमार्य को
उसके पिता ने
चंद रुपयों के लिए
एक अधेड़ शराबी को
बेच दिया था
अब जीवन भर उसे
रोना था
गरीबी का नतीजा
सहना था
चूल्हे,चौके की आग में
निरंतर जलना था
घुट घुट कर मरना था
गरीबी का मूल्य
चुकाना था
03-10-2011
1599-08-10-11

Thursday, July 7, 2011

लाचारी

कल रात फिर
कोई सौ का नोट
दे गया
बेटी को साथ
ले गया
अंधा,अपाहिज था
खून खौलता रहा
पेट के खातिर
चुप रहा
रात भर रोता रहा
जान देना चाहता था
बेटी के खातिर
खामोशी से सहता
रहता
उसकी गरीबी
और लाचारी का
मज़ाक उड़ता रहता
बेटी निरंतर बाप के
खातिर
शरीर बेचती रहती
हवस का शिकार
होती रहती
मर मर कर
जीती रहती

जीने की तमन्ना
दोनों को मरने
नहीं देती  
06-07-2011
1146-30-07-11

Monday, June 20, 2011

निरंतर फक्कड़ रहा हूँ , फक्कड़ ही रह लूं

चार गाडी खरीद लूं
देश विदेश की सैर कर लूं
कुछ सोना,चांदी खरीद लूं
धनवानों में गिनती होगी
आगे पीछे भीड़ होगी
मेरी भी पूछ होगी
छाती चौड़ी होगी
मन को तसल्ली होगी
फिर रातों की नींद उडेगी
चोरी की चिंता रहेगी
लोगों को जलन होगी
रंजिश में शिकायतें होगी
इनकम टैक्स वालों की 
जांच होगी
छुपी बातें बाहर आयेंगी 
वकील की जरूरत पड़ेगी
मोटी फीस देनी पड़ेगी
ज़िन्दगी हराम होगी
मरने की इच्छा करेगी
जब मरना ही है
तो क्यूं सब खरीदूं ?
निरंतर फक्कड़ रहा हूँ
फक्कड़ ही रह लूं
यूँ ही ख्वाब देखता रहूँ
अमीरी,गरीबी
 ख़्वाबों में देख लूं
टाइम पास करने के लिए
आखिर कुछ तो करूँ
20-06-2011
1078-105-06-11