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Sunday, March 3, 2013

गरीब बेचारा गरीब रह गया



आंकड़ों के
मकड़ जाल में सारा देश
उलझ गया
गरीब बेचारा गरीब रह गया
मुद्रास्फीति,महंगाई दर ,
रोज़ कितने पैसों में
गरीब का घर चलता
इस जोड़ बाकी में
गरीब बेचारा पिस गया
वातानुकूलित कमरों में बैठे
अर्थशास्त्रियों की ज़द्दोज़हद में
गरीब बेचारा उलझ गया
उसे क्या लेना देना
क्या बड़ा क्या घटा
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में
थक चुका आंकड़ों के जाल से
उसके तो पेट की भूख
मिटनी चाहिए
पीने को स्वच्छ पानी
सर पर छत होनी चाहिए
बच्चों को शिक्षा,स्वस्थ शरीर
क़ानून का राज़ चाहिए
दर बड़े या घटे
नेता झूठ बोले या सच
उसे कोई मतलब नहीं
उसे तो बस आराम की
नींद आनी चाहिए
07-07-03-01-2013
देश,सरकार,राज,गरीब,जनता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Thursday, December 20, 2012

देश में अज़ब तमाशा हो गया है



देश में अज़ब तमाशा हो गया है
प्रजातंत्र का सत्यानाश हो गया है
देश नेताओं की भेंट चढ़ गया है
नेता का बेटा भी नेता हो गया है
रातों रात अमीरों को बाप हो गया
बिना पैंदे का नेता तो बना ही
बिना धंधे का धंधेबाज़ हो गया है
पढ़ा चाहे चार क्लास भी नहीं हो
पढने वालों से आगे निकल गया है
बेकार से अब काम का हो गया है
गरीब बेचारा गरीब ही रह गया है
पहले भी भूख से मरता रहा है
अब भी भूख से मर रहा है
देश में अज़ब तमाशा हो गया है
974-93-20-12-2012
देश,भ्रष्टाचार,नेता, प्रजातंत्र

Saturday, December 15, 2012

हमने आज़ाद हो कर क्या देखा



हमने आज़ाद हो कर
क्या देखा
देखा जो खवाबों में भी
नहीं सोचा
रिश्तों को
तार तार होते देखा
बेटे को बाप को
गाली देते देखा
माँ बहन को सरे बाज़ार
ज़लील होते देखा
कमज़ोर को ताकतवर से
मार खाते देखा
गरीब को
और गरीब होते देखा
किसानों को
आत्मह्त्या करते देखा
बेईमानों को
मालामाल होते देखा
राज़ करने वालों को
ऐशों आराम करते देखा
अब आम आदमी को 
आम आदमी के लिए
राज करने के सिवाय
कुछ देखने की इच्छा
बाकी नहीं है
949-68-15-12-2012
स्वाधीनता,आजादी,आज़ाद,देश

Wednesday, November 28, 2012

आराम से सोये तो तीन आ जाएँ , कसमसाकर सोना हो तो चार (व्यंग्य)



आराम से सोये
तो तीन आ जाएँ
कसमसाकर सोना हो तो चार
ठूंस ठांस कर सोना हो तो पांच
पर गरीब की झोंपड़ी थी
आजादी से आज तक
उतनी ही है
चार पांच हाड मांस के पुतले
उसमें ज़िंदा रहते
कोई रात भर खांसता,
कोई जुखाम में नाक
सुकुड़ता रहता
बाकी बचे लोग ना रुकने वाली
आवाजों के कारण जागते रहते
सवेरे अधसोए अधजगे उठते
पेट भरने के लिए
काम पर निकल पड़ते
रात को थक चूर कर
पहले से अधिक कमज़ोर लौटते
इसी झोंपड़ी में एक से दो हुए
फिर दो से तीन,चार,पांच हुए
कुछ साल में
कभी एक कम हो जाता
तो कभी एक नया जुड़ जाता
झोंपड़ी में
आजादी के बाद बिजली का
एक मरियल सा लट्टू
अवश्य लटक गया
जिसने रात के अँधेरे को तो
कम कर दिया
पर ज़िन्दगी के अँधेरे को
कम ना कर सका
ज़िन्दगी आजादी के पहले भी
लडखडाती थी
लूले लंगड़े प्रजातंत्र में
आज भी लडखडा रही है
देश में और कुछ
बदला ना बदला हो
गरीब की झोंपड़ी नहीं बदली
ऐतहासिक धरोहर सी
अब भी आजादी से पहले की
याद दिलाती है
869-53-28-11-2012
व्यंग्य,आजादी,देश,गरीबी,भुखमरी,प्रजातंत्र

Friday, November 23, 2012

जात पांत धर्म की राजनीति में देश कुरुक्षेत्र बन गया



जात पांत धर्म की
राजनीति में
देश कुरुक्षेत्र बन गया
प्यार और भाईचारा
रक्त रंजित हो गया
हर दिन का इतिहास
खून से लिखा जा रहा
भाई भाई की जान ले रहा
अपना पराया हो गया
दिलों में अन्धकार
घर कर गया
कब जलेगा प्यार
भाईचारे का दीपक
कब बुझेगी दिलों में
नफरत की आग
कब इंसानियत
बन जायेगी जात
प्यार बनेगा धर्म
कब कुरुक्षेत्र  में
रक्तपात ख़त्म होगा
इंतज़ार में हर
समझदार इश्वर से
प्रार्थना कर रहा
864-48-23-11-2012
जात,पांत, धर्म ,राजनीति,देश 

Friday, November 16, 2012

मेरे देश की मिट्टी में बसी है शहीदों के बलिदान की सुगंध



मेरे देश की मिट्टी में
बसी है
शहीदों के बलिदान की
सुगंध
वीरांगनाओं की
चिता की गर्मी
मेरे देश की हवा में
गूंजती है
संतों,महापुरुषों की
अमर वाणी
त्याग बलिदान की
अमिट कहानी
मेरी देश की
नदियों में बहती है
प्यार भाई चारे की धारा
मेरे देश की
संस्कृति में घुली है
सत्य अहिंसा
मान मर्यादा
मेरे देश की मिट्टी को
दूषित मत करो
मेरे देश की हवाओं को
प्रदूषित मत करो
देश के लिए जान
न्योछावर करने वालों की
आत्माओं को
व्यथित मत करो
मेरे देश की धरती को
माँ कहते हो
समय आ गया है
पानी सर से गुजर गया है
अब देश को
भ्रष्टाचार मुक्त कर दो
भ्रष्टाचारियों को सजा दे दो
देश के दुश्मनों का
सफाया कर दो
धरती माँ की लाज रख लो
845-29-16-11-2012 
भारत,देश,देश भक्ति,शहीद,राष्ट्र,भ्रष्टाचार,

Sunday, August 26, 2012

देश आज़ाद है



बाप खदान में
पत्थर तोड़ता
माँ भट्टे पर मिट्टी
उठाती
फटे कपड़ों में बच्चा
कचरे के ढेर से थैलियाँ
बीनता
सुख की बात ही कहाँ ?
परिवार बामुश्किल
जीवित रहने के लिए
कड़ी धूप में झुलसता
एक दिन निकलता
शरीर पहले से अधिक
काला और कमज़ोर पड़ता
फिर भी बाप
छोटी सी खोली में
जिसका महीने का किराया
पत्नी के महीने भर की
मेहनत को लील लेता
प्रसन्नता से भगवान् को
धन्यवाद देता
कल का दिन निकल जाए
पेट भर जाए
मन से प्रार्थना करता
रात भर खांसता रहता
मकान,गाडी,का सपना
देखने का भी समय नहीं
मिलता
अभी ज़ल्दी भी कहाँ है
पेट की अग्नि बुझाने की
पक्की व्यवस्था हो जाए
तो वो भी देख लेगा
बातों में निरंतर सुनता
देश आज़ाद है
जनता की सरकार है
पर उसे
कोई फर्क नहीं पड़ता
उसे आजादी से
पहले और आज में
कोई फर्क नहीं लगता
जो अपने माँ बाप को
करते देखता था
वो भी वही कर रहा
26-08-2012
696-56-08-12

Saturday, May 12, 2012

कौन कहता है ऊंचे पहाड़ों पर घास के मैदान नहीं होते

कौन कहता है
ऊंचे पहाड़ों पर घास के
मैदान नहीं होते
ऊंचे लोग धरातल से
जुड़े नहीं होते
हुए हैं इस देश में नेता
गाँधी,सुभाष पटेल
जैसे भी
ना अहम् था,ना स्वार्थ था
ना ही खुद का ध्यान था
जीवित रहे जब तक
सोचते रहे देशवासियों के
भले के लिए
जिए जब तक जिए
देश और देशवासियों
के लिए
क्रतव्य की बलि वेदी पर
करी जान न्योछावर
देश और देशवासियों
के लिए
12-05-2012
512-26-05-12


Friday, February 10, 2012

इस देश में कुछ नहीं बदलेगा

गणतंत्र दिवस
हर वर्ष आयेगा
स्वतंत्रता दिवस भी
आयेगा
गरीब गरीब ही रहेगा
भ्रष्टाचार
दिन दूना रात चौगना
बढ़ता जाएगा
इंसान,इंसान की कद्र
भूल जाएगा
दिलों से प्यार का
नामोनिशान मिट
जाएगा
इस देश में कुछ नहीं
बदलेगा
जब तक लोगों में
देश प्रेम नहीं होगा
देश के लिए
मर मिटने का ज़ज्बा
नहीं होगा
10-02-2012
143-54-02-12