Showing posts with label आजादी. Show all posts
Showing posts with label आजादी. Show all posts

Saturday, December 15, 2012

हमने आज़ाद हो कर क्या देखा



हमने आज़ाद हो कर
क्या देखा
देखा जो खवाबों में भी
नहीं सोचा
रिश्तों को
तार तार होते देखा
बेटे को बाप को
गाली देते देखा
माँ बहन को सरे बाज़ार
ज़लील होते देखा
कमज़ोर को ताकतवर से
मार खाते देखा
गरीब को
और गरीब होते देखा
किसानों को
आत्मह्त्या करते देखा
बेईमानों को
मालामाल होते देखा
राज़ करने वालों को
ऐशों आराम करते देखा
अब आम आदमी को 
आम आदमी के लिए
राज करने के सिवाय
कुछ देखने की इच्छा
बाकी नहीं है
949-68-15-12-2012
स्वाधीनता,आजादी,आज़ाद,देश

Wednesday, November 28, 2012

आराम से सोये तो तीन आ जाएँ , कसमसाकर सोना हो तो चार (व्यंग्य)



आराम से सोये
तो तीन आ जाएँ
कसमसाकर सोना हो तो चार
ठूंस ठांस कर सोना हो तो पांच
पर गरीब की झोंपड़ी थी
आजादी से आज तक
उतनी ही है
चार पांच हाड मांस के पुतले
उसमें ज़िंदा रहते
कोई रात भर खांसता,
कोई जुखाम में नाक
सुकुड़ता रहता
बाकी बचे लोग ना रुकने वाली
आवाजों के कारण जागते रहते
सवेरे अधसोए अधजगे उठते
पेट भरने के लिए
काम पर निकल पड़ते
रात को थक चूर कर
पहले से अधिक कमज़ोर लौटते
इसी झोंपड़ी में एक से दो हुए
फिर दो से तीन,चार,पांच हुए
कुछ साल में
कभी एक कम हो जाता
तो कभी एक नया जुड़ जाता
झोंपड़ी में
आजादी के बाद बिजली का
एक मरियल सा लट्टू
अवश्य लटक गया
जिसने रात के अँधेरे को तो
कम कर दिया
पर ज़िन्दगी के अँधेरे को
कम ना कर सका
ज़िन्दगी आजादी के पहले भी
लडखडाती थी
लूले लंगड़े प्रजातंत्र में
आज भी लडखडा रही है
देश में और कुछ
बदला ना बदला हो
गरीब की झोंपड़ी नहीं बदली
ऐतहासिक धरोहर सी
अब भी आजादी से पहले की
याद दिलाती है
869-53-28-11-2012
व्यंग्य,आजादी,देश,गरीबी,भुखमरी,प्रजातंत्र

Sunday, August 26, 2012

देश आज़ाद है



बाप खदान में
पत्थर तोड़ता
माँ भट्टे पर मिट्टी
उठाती
फटे कपड़ों में बच्चा
कचरे के ढेर से थैलियाँ
बीनता
सुख की बात ही कहाँ ?
परिवार बामुश्किल
जीवित रहने के लिए
कड़ी धूप में झुलसता
एक दिन निकलता
शरीर पहले से अधिक
काला और कमज़ोर पड़ता
फिर भी बाप
छोटी सी खोली में
जिसका महीने का किराया
पत्नी के महीने भर की
मेहनत को लील लेता
प्रसन्नता से भगवान् को
धन्यवाद देता
कल का दिन निकल जाए
पेट भर जाए
मन से प्रार्थना करता
रात भर खांसता रहता
मकान,गाडी,का सपना
देखने का भी समय नहीं
मिलता
अभी ज़ल्दी भी कहाँ है
पेट की अग्नि बुझाने की
पक्की व्यवस्था हो जाए
तो वो भी देख लेगा
बातों में निरंतर सुनता
देश आज़ाद है
जनता की सरकार है
पर उसे
कोई फर्क नहीं पड़ता
उसे आजादी से
पहले और आज में
कोई फर्क नहीं लगता
जो अपने माँ बाप को
करते देखता था
वो भी वही कर रहा
26-08-2012
696-56-08-12

Monday, December 26, 2011

व्यथित मन का मित्रों को पत्र

जन्म के साथ ही
आजादी के नाम से
मेरा परिचय हुआ
गाँधी,सुभाष,भगत सिंह
चन्द्र शेखर और देश के लिए
लड़ने वालों को जाना
संस्कारों ,मर्यादाओं
का पालन होते देखा
निस्वार्थ
सार्वजनिक जीवन जीते
नेताओं को देखा
आजादी मिली
हर देशवासी के मन में
उमंग और खुशी थी
अपने देश में
अपनों पर
अपनों का राज देखना
बाकी था
अब तक जो देखा था
उससे पूर्ण
आशा और विश्वास था
अब गरीब गरीब नहीं रहेगा
देश का धन देश में रहेगा
हर देशवासी का जीवन
सुखद होगा
प्यार भाईचारे का वर्चस्व
होगा
आज जन्म के ७० वर्ष बाद
मुझे लगता है
बचपन में जो देखा था
जो सोचा था
वैसा कुछ भी नहीं है
क्या सब भ्रम था ?
क्या अपनों से प्रेम की
आशा करना गलत था ?
क्या अपनों का
अपनों पर राज़ करना
एक दुस्वप्न था ?
अपनों के बीच
खुल कर रो भी नहीं सकता
क्या क्या केवल मैं घुटता हूँ ?
क्या केवल मैं व्यथित हूँ ?
इस प्रश्न का उत्तर खोज
रहा हूँ
मेरे मित्रों से
आग्रह पूर्वक निवेदन करता हूँ
मेरे प्रश्न का उत्तर दें
अगर सहमत हैं ,
तो मुझे बताएं
व्यथा को कम करने के लिए

व्यवस्था को बदलने के लिए
वे क्या कर रहे हैं ?
26-12-2011
1890-58-12