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Wednesday, December 5, 2012

भूत भविष्य के सोच में



बचपन में
बचपन को कोसता था
स्कूल जाना
परीक्षा देना अच्छा नहीं
लगता था
केवल खाना खेलना
भाता था
जवानी में काम करना
जिम्मेदारियां निभाना
दुरूह लगता था
बचपन याद आता था
अब बुढापे में अलमस्त
जवानी याद आती है
बुढापा काटना को
दौड़ता है
क्यों ऐसा होता है
इंसान अपने वर्तमान से
खुश नहीं रहता
भूत भविष्य के सोच में
डूबा रहता है
898-16-05-12-2012
बचपन,जवानी,बुढापा,जीवन,वर्तमान,भूत,भविष्य

भूत भविष्य के सोच में


बचपन में
बचपन को कोसता था
स्कूल जाना
परीक्षा देना अच्छा नहीं
लगता था
केवल खाना खेलना
भाता था
जवानी में काम करना
जिम्मेदारियां निभाना
दुरूह लगता था
बचपन याद आता था
अब बुढापे में अलमस्त
जवानी याद आती है
बुढापा काटना को
दौड़ता है
क्यों ऐसा होता है
इंसान अपने वर्तमान से
खुश नहीं रहता
भूत भविष्य के सोच में
डूबा रहता है
898-16-05-12-2012
बचपन,जवानी,बुढापा,जीवन,वर्तमान,भूत,भविष्य

Saturday, November 3, 2012

बचपन तो लौट नहीं सकता



बचपन तो
लौट नहीं सकता
पर बच्चा बन कर तो
रह सकता हूँ
आज झगडा कल
दोस्ती तो कर सकता हूँ
पुरानी बातें को आसानी से
भूल तो सकता हूँ
हर खेल तो खेल सकता हूँ
उम्र में बड़ों को
भैया,चाचा,ताऊ तो
कह सकता हूँ
कहीं बैठ सकता हूँ
कहीं खा सकता हूँ
बिना धर्म जात पांत जाने
नए दोस्त तो बना
सकता हूँ
बेफिक्र जीवन तो
जी सकता हूँ
बचपन तो
लौट नहीं सकता
पर बच्चा बन कर तो
रह सकता हूँ
821-05-03-11-2012
बचपन

Friday, September 7, 2012

अपना पेट तो मैं भी भर लेता हूँ



एक दस साल के बच्चे को
ढाबे पर
बर्तन मांजते देखा
मन दुखी हुआ
उससे पूछ लिया
तुम इतनी छोटी उम्र में
पढ़ते क्यों नहीं
काम क्यों करते हो
उसके जवाब ने मुझे
निरुत्तर कर दिया
कहने लगा
बाबूजी आपने पढ़ कर
क्या पा लिया
अपना पेट भरने के सिवाय
कितने भूखों का पेट भर दिया
कितने बच्चों को स्कूल
पढने भेज दिया
केवल बातें बनाना ही
तो सीखा है
वो तो मैं भी कर लेता हूँ
अपना पेट तो मैं भी
भर लेता हूँ
07-09-2012
726-22-09-12

Wednesday, March 14, 2012

जितना हँस सकूँ,उतना हँस लूँ

अब थकने लगा हूँ
ज़िन्दगी से डरने लगा हूँ
क्या होगा
आने वाले बरसों में
डर से सहमने लगा हूँ
क्यों बूढा होता इंसान
निरंतर सोचता हूँ
क्यों लौटता नहीं बचपन
खुदा से पूछता हूँ
फिर खुद को संभालता हूँ
खुद से कहता हूँ
जो होना होगा हो
जाएगा
जब होगा देखा जाएगा
अभी से क्यूं
हाल को बेहाल करूँ
जितना
हँस सकूँ उतना हँस लूँ
ज़िन्दगी मस्ती में
गुजार लूँ
13-03-2012
366-100-03-12

Saturday, February 4, 2012

कुछ लम्हों के लिए

जब परेशां होता हूँ
उजाला भी काटने को
दौड़ता
अन्धेरा अच्छा लगने
लगता
मन करता
आँखें बंद कर
किसी कौने में दुबक
जाऊं
कोई चेहरा
नज़र नहीं आये मुझे
हर शख्श ,हर बात को
भूल जाऊं
बचपन की यादों में
लौट जाऊं
कुछ लम्हों के लिए
ही सही
फिर से हंसने लगूँ
04-02-2012
107-17-02-12

Saturday, August 13, 2011

नन्हे हाथ अब नर्म नहीं रहे

नन्हे हाथ अब

नर्म नहीं रहे

दो रोटी के लिए

मिट्टी से सन गए

जीने की मजबूरी में

खुरदरे हो गए

खुद के वज़न से

ज्यादा बोझ

उठाने लगे

खेलने की उम्र में

निरंतर कर्म में

जुट गए

सर्दी,गर्मी सब

भूल गए

वक़्त से पहले ही

जीवन की

कडवी सच्चाई से

मुखातिब हो गए

हम खड़े देखते रहे

सवालों में उलझे रहे

13-08-2011

1352-74-08-11

Thursday, August 11, 2011

जी चाहता फिर से बच्चा बन जाऊं

जी चाहता

फिर से बच्चा

बन जाऊं

छल कपट से

दूर हो जाऊं

अहम् ,अहंकार

दूर भगाऊँ

निरंतर

निश्छल जीऊँ

परमात्मा के

करीब

पहुँच जाऊं

जीवन की

क्लिष्ट्ताओं से

बच जाऊं

11-08-2011

1334-56-08-11