Saturday, February 4, 2012

कुछ लम्हों के लिए

जब परेशां होता हूँ
उजाला भी काटने को
दौड़ता
अन्धेरा अच्छा लगने
लगता
मन करता
आँखें बंद कर
किसी कौने में दुबक
जाऊं
कोई चेहरा
नज़र नहीं आये मुझे
हर शख्श ,हर बात को
भूल जाऊं
बचपन की यादों में
लौट जाऊं
कुछ लम्हों के लिए
ही सही
फिर से हंसने लगूँ
04-02-2012
107-17-02-12

2 comments:

induravisinghj said...

sabse maasoom bachpan ki yaadey............

anju(anu) choudhary said...

बचपन की कुछ यादे ...हर वक्त साथ रहती हैं जिन्हें ...जीना हर किसी को अच्छा लगता हैं ...बचपन क्यों नहीं लौट के आ सकता ?