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Thursday, January 5, 2012

समाधान


शमशान में
वर्षों से खडा बरगद का
विशालकाय पेड़
आज कुछ व्यथित था
मन में उठ रहे प्रश्नों से
त्रस्त था
विचार पीछा ही नहीं
छोड़ रहे थे
क्रमबद्ध
तरीके से चले आ रहे थे
क्यों उसका
जन्म शमशान में हुआ?
यहाँ आने वाला
हर व्यक्ति केवल जीवन ,
म्रत्यु और वैराग्य की
बात ही करता
कोई खुशी से
 उसके पास नहीं आता
उसकी छाया के नीचे
कोई सोना नहीं चाहता
ना ही आवश्यकता से
अधिक रुकना चाहता
उसे निरंतर मनुष्यों का
क्रंदन ही सुनना पड़ता
रात में मरघट की शांती
उसे झंझोड़ती रहती
नहीं चाहते हुए भी
राख के ढेर में कुत्तों को
मानव अवशेष ढूंढते
देखना पड़ता 
क्यों उसे जीने के लिए
शमशान ही मिला ?
क्या वो भी मनुष्यों जैसे
पिछले जन्म के
अपराधों की सज़ा काट
रहा?
क्यों उसके भाग्य में ही
एकाकी,नीरस जीवन
जीना लिखा है ?
निरंतर उदास चेहरों को
देखना
उनकी दुःख भरी बातों को
सुनना
हर दिन रोने बिलखने की
आवाज़ सुनना
ही उसके जीवन का सत्य है
तभी उसे नीचे बैठे
वृद्ध साधू की आवाज़
सुनायी दी
वो किसी को कह रहा था
परमात्मा ने जो भी दिया
जैसा भी दिया
जितना भी दिया 
उसे शिरोधार्य करना चाहिए
निरंतर संतुष्ट रहने का
प्रयास करना चाहिए
जब तक जीना है
खुशी से परमात्मा की
इच्छा समझ कर
जीना चाहिए
व्यर्थ ही दुखी होने से
जीवन सुखद नहीं होता
उलटे अवसाद को
निमंत्रण मिलता
जीवन कंटकाकीर्ण
 हो जाता
बरगद को लगा
उसे उसके प्रश्न का
उत्तर मिल गया
उसकी व्यथा का
समाधान हो गया
05-01-2012
14-14-01-12

Saturday, October 1, 2011

उनका अकस्मात चुप हो जाना

उनका
अकस्मात चुप
हो जाना
मन में प्रश्न खड़े
कर रहा
क्या त्रुटि हुयी मुझ से
मन स्वयं से पूछ रहा
ह्रदय पीड़ा से व्यथित
हो रहा
क्या किसी बात ने
अनजाने में 
उनके ह्रदय को ठेस
पहुँचायी
क्या मर्यादाओं का
उलंघन हुआ ?
क्या समस्याओं में
घिर गए ?
निरंतर प्रश्नों का
उत्तर खोज रहा हूँ
परमात्मा से
प्रार्थना कर रहा हूँ
उनकी
समस्याएं सुलझा दे
मन में पल रहे प्रश्नों का
समाधान करे
मुझे चिंता मुक्त करे
उनकी झोली
खुशियों से भर दे
उन्हें 
आनंद प्रदान करे
30-09-2011
1589-160-09-11

Thursday, July 7, 2011

उम्मीद और समाधान (लघु कथा )

आज फिर नीम के पेड़ के नीचे,मूंज की खाट पर लेटे लेटे,वो सोच रहा था,गर्मी बहुत है,घर में बिजली होती तो आराम से पंखे के नीचे सोता,पर क्या करे? इतने पैसे कभी नहीं बचे कि बिजली लगवा सके.

इस बार फसल अच्छी होगी तो बिजली ज़रूर लगवायेगा ,गाँव में अकेला था,जिस के घर में बिजली नहीं थी .सब उसे बार बार बिजली लगवाने के लिए टोकते रहते थे,वो किसी तरह उन्हें टालता रहता ,उन्हें कैसे बताता ?घर का खर्च मुश्किल से चलता है ,इज्ज़त के खातिर झूठे बहाने भी बनाने पड़ते.पर क्या करे ?डेढ़ बीघा ज़मीन के टुकड़े में इतना पैदा ही नहीं होता,कि बिजली का बिल भर सके, आखिर लाईट लगवाने के अलावा ,बल्ब,पंखे में भी खरीदने पड़ते हैं ,उसके भी तो पैसे लगते हैं.बरस हो गए उम्मीद करते करते पर किसी भी साल फसल बहुत अच्छी नहीं हुयी ,फिर बच्चे होने के बाद खर्च भी तो बढ़ा है.

मक्खियाँ उड़ाते उड़ाते.विचारों का आना जाना चलता रहा ,नींद की झपकी आती, कोई मक्खी मुंह पर  बैठती तो नींद उड़ जाती जहां मक्खी बैठी थी ,वहाँ खुजाता ,मक्खी बैठी हो तो मारने की कोशिश करता ,एक चपत गाल पर लगाता ,मक्खी तो नहीं मरती ,चपत खुद को लगती ,एक गाली मक्खी को देता ,करवट बदलता फिर खुद से कहता  बिजली से ज्यादा ज़रूरी मक्खी भगाना है . फिर से विचारों का प्रवाह होने लगता ,बिजली का ख्याल दिमाग में आता,अचानक खुद से कहने लगता ,इतने बरस बिना बिजली के काटे ,अब बिजली नहीं है तो कौन सा पहाड़ टूट रहा है ? बिजली नहीं होगी तो पैसे बचेंगे किसी और काम आयेंगे.बेकार में  निरंतर बिजली के बारे में सोच कर दिमाग खराब करता हूँ, इज्ज़त के लिए झूठ भी बोलना पड़ता है.पहले भी तो गाँव में सब बिना बिजली के रहते थे.ये उम्मीद भी क्या चीज़ है ,उम्मीद में आधी से ज्यादा ज़िन्दगी कट गयी ,पर कभी पूरी नहीं होती,नित नयी जागती रहती,उम्मीद नहीं होती तो इंसान के लिए जीना मुश्किल हो जाता.सोचते सोचते आखिर बिना बिजली के उसको नींद आ ही गयी और वो गहरी नींद में सो गया.

समस्याओं से लड़ना,विचारों से समाधान निकालना,जीवन गरीबी में गुजारना उसकी आदत बन गया था, पर खुद ही विचारों से समाधान ढूंढ कर,संतुष्ट हो,गहरी नींद में सोता ज़रूर था.