Showing posts with label संतुष्टि. Show all posts
Showing posts with label संतुष्टि. Show all posts

Friday, March 1, 2013

किसी और से क्यों आशा करूँ



जब
भाग्य ने दिया इतना
जिसकी कभी
आशा भी ना थी
फिर भी आज खुश
क्यों नहीं हूँ
जो निर्णय
मैंने स्वयं किये थे
उन निर्णयों के लिए
किसी और को
क्यों जिम्मेदार कहूं
किसी से
सलाह मांगी होगी
उसकी सलाह भी
मानी होगी
ठीक नहीं निकली
तो उसकी गलती
कैसे मानूं
फिर जिस पथ पर
चल कर आज
यहाँ तक पहुंचा
उस पथ को कैसे दोष दूं
कुछ कमी
मुझ में ही रही होगी
जो आज खुश नहीं हूँ
अगर खुशी ढूंढनी है
तो मुझे ही बदलना होगा
किसी और से
क्यों आशा करूँ
04-04-02-01-2013
भाग्य,खुशी,संतुष्टि,संतुष्ट ,आशा,निराशा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Wednesday, February 27, 2013

मैं कुंठित नहीं हूँ



मैं कुंठित नहीं हूँ
जो किसी से प्रशंसा की
आशा करूँ
किसी के आलोचना
करने पर क्रोध करूँ
किसी के पैमाने पर
खरा उतरने के लिए
सिद्धांतों से समझौता करूँ
मैं जैसा भी हूँ
वैसा ही हूँ
पर कुंठित हो कर
जीता नहीं हूँ
निरंतर लिखता रहता हूँ
खुश रहता हूँ
मन को संतुष्ट रखता हूँ
जो भी स्वीकार करे
उसे भी नमन
जो ना करे उसे भी
नमन करता हूँ
01-01-01-01-2013
कुंठित,संतुष्ट,संतुष्टि
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

Sunday, December 30, 2012

कोई रात अंधेरी नहीं होती



कोई रात
अंधेरी नहीं होती
कोई दिन
उजला नहीं होता
केवल रोशनी की कमी
या अधिकता होती
मन संतुष्ट
ह्रदय प्रसन्न हो तो
काली रात उजली
उजले दिन में भी
अन्धेरा लगता
976-95-30-12-2012
मन,ह्रदय,संतुष्ट,संतुष्टि

Sunday, July 17, 2011

दुखी


वो सबसे दुखी जो

निरंतर समझता

खुद को दुखी

जो खुदा ने दिया

उस से तृप्ति  नहीं होती

जुबान से सदा खीज

प्रकट होती

संतुष्टि उस से कोसों

दूर रहती

ज़िन्दगी रोते रोते

कटती

17-07-2011
1198-78-07-11

Thursday, July 7, 2011

उम्मीद और समाधान (लघु कथा )

आज फिर नीम के पेड़ के नीचे,मूंज की खाट पर लेटे लेटे,वो सोच रहा था,गर्मी बहुत है,घर में बिजली होती तो आराम से पंखे के नीचे सोता,पर क्या करे? इतने पैसे कभी नहीं बचे कि बिजली लगवा सके.

इस बार फसल अच्छी होगी तो बिजली ज़रूर लगवायेगा ,गाँव में अकेला था,जिस के घर में बिजली नहीं थी .सब उसे बार बार बिजली लगवाने के लिए टोकते रहते थे,वो किसी तरह उन्हें टालता रहता ,उन्हें कैसे बताता ?घर का खर्च मुश्किल से चलता है ,इज्ज़त के खातिर झूठे बहाने भी बनाने पड़ते.पर क्या करे ?डेढ़ बीघा ज़मीन के टुकड़े में इतना पैदा ही नहीं होता,कि बिजली का बिल भर सके, आखिर लाईट लगवाने के अलावा ,बल्ब,पंखे में भी खरीदने पड़ते हैं ,उसके भी तो पैसे लगते हैं.बरस हो गए उम्मीद करते करते पर किसी भी साल फसल बहुत अच्छी नहीं हुयी ,फिर बच्चे होने के बाद खर्च भी तो बढ़ा है.

मक्खियाँ उड़ाते उड़ाते.विचारों का आना जाना चलता रहा ,नींद की झपकी आती, कोई मक्खी मुंह पर  बैठती तो नींद उड़ जाती जहां मक्खी बैठी थी ,वहाँ खुजाता ,मक्खी बैठी हो तो मारने की कोशिश करता ,एक चपत गाल पर लगाता ,मक्खी तो नहीं मरती ,चपत खुद को लगती ,एक गाली मक्खी को देता ,करवट बदलता फिर खुद से कहता  बिजली से ज्यादा ज़रूरी मक्खी भगाना है . फिर से विचारों का प्रवाह होने लगता ,बिजली का ख्याल दिमाग में आता,अचानक खुद से कहने लगता ,इतने बरस बिना बिजली के काटे ,अब बिजली नहीं है तो कौन सा पहाड़ टूट रहा है ? बिजली नहीं होगी तो पैसे बचेंगे किसी और काम आयेंगे.बेकार में  निरंतर बिजली के बारे में सोच कर दिमाग खराब करता हूँ, इज्ज़त के लिए झूठ भी बोलना पड़ता है.पहले भी तो गाँव में सब बिना बिजली के रहते थे.ये उम्मीद भी क्या चीज़ है ,उम्मीद में आधी से ज्यादा ज़िन्दगी कट गयी ,पर कभी पूरी नहीं होती,नित नयी जागती रहती,उम्मीद नहीं होती तो इंसान के लिए जीना मुश्किल हो जाता.सोचते सोचते आखिर बिना बिजली के उसको नींद आ ही गयी और वो गहरी नींद में सो गया.

समस्याओं से लड़ना,विचारों से समाधान निकालना,जीवन गरीबी में गुजारना उसकी आदत बन गया था, पर खुद ही विचारों से समाधान ढूंढ कर,संतुष्ट हो,गहरी नींद में सोता ज़रूर था.

Thursday, March 31, 2011

पहल कौन करे?


दोंनों ट्रेन में
आमने सामने बैठे थे
रह रह कर
एक दूसरे को देखते थे
चेहरे इक दूजे को
जाने पहचाने लगते 
कभी कनखियों से,
कभी नज़रें मिला कर
कहाँ देखा? 
याद करने की कोशिश 
करते रहे
दिमाग पर जोर डालते रहे ,
कौन पहल करे,सोचते रहे
स्टेशन आया
एक की यात्रा पूरी हुयी
जिज्ञासा ख़त्म ना हुयी
भाग कर डब्बे पर लगी
आरक्षण सूची पढी तो
उस सीट पर बैठे शख्श का
नाम पता पडा
याद आया पुराना मित्र था
स्कूल में साथ पढता था
आज चालीस वर्ष बाद
देखना हुआ
मिलने की इच्छा में भाग कर
डब्बे में चढ़ने के कोशिश करी ,
पर ट्रेन गति पकड़ चुकी थी
मिलने की इच्छा अधूरी रह गयी
झिझक और पहल कौन करे?
 के अहम् ने
आज मित्र से मिलने का
सुनहरी अवसर गवां दिया
अब पछता रहा था 
इंसान निरंतर अहम् में
खोता रहा
सिवा झूठी संतुष्टि किसी को
आज तक कुछ ना मिला
31-03-03
560—230-03-11