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Monday, March 12, 2012

सब्र के कपडे पहन लें ,मन में सहनशीलता ओढ़ लें

तुम कहो मैं सुनूँ 
जैसा चाहो वैसा करूँ
नहीं मानूं 
तो तुम रूठ जाओ
फिर मैं तुम्हें मनाऊँ 
मैं कहूं तुम सुनो 
जो चाहूँ वो करो 
नहीं करो तो मैं रूठ जाऊं
फिर तुम मुझे मनाओ 
दोनों यूँ ही 
रूठते मनाते रहेंगे 
आपस में लड़ते झगड़ते 
रहेंगे 
जीवन यूँ ही काटते रहेंगे
ना नें खुश रहूँगा 
ना तुम खुश रहोगे
क्यों ना थोड़ा सा खुद को 
बदल लें
रूठने मनाने की 
आवश्यकता ना पड़े
दोनों सब्र के कपडे 
पहन लें
मन में सहनशीलता 
ओढ़ लें
कुछ मेरा कुछ तुम्हारे 
मन का कर लें
जीवन काटने के बजाय 
खुशी से जी लें 
12-03-2012
353-87-03-12

Thursday, February 9, 2012

निश्छल प्रेम

नदी का
निर्मल शीतल जल
समुद्र के प्रेम में मग्न
अविरल बहते हुए
समुद्र से मिलने
चल देता
कोई पथ से रोके
अवरोधक बने
अपने
पथ से डिगता नहीं
निरंतर नया पथ
बनाता
सहनशीलता संजोये
बिना व्यथित हुए
अपने लक्ष्य की ओर
अग्रसर होता रहता
समुद्र की गोद में
समा कर
लक्ष्य प्राप्त करता
अपने
निश्छल प्रेम को
पा लेता
09-02-2012
134-45-02-12