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Sunday, October 7, 2012

मैं कबीर बनना चाहता हूँ



मैं कबीर बनना
चाहता हूँ
सीधे सपाट शब्दों में
अपनी बात दुनिया तक
पहुचाना चाहता हूँ
कोई पुरूस्कार ना मिले
कोई किताब ना छपे
कुछ फर्क नहीं पडेगा
मुझ को पढने वाले
मेरी बात समझ ले
बस इतनी सी तमन्ना
रखता हूँ
आत्म संतुष्टी के
लिखता हूँ
अगर भला किसी का
हो जाए
दो पल भी खुश हो जाए 
उसे ही पुरूस्कार
समझता हूँ
767-12-07-10-2012
कबीर 

Monday, February 13, 2012

यूँ ही नहीं याद करते लोग कबीर,रहीम को

यूँ ही नहीं
याद करते लोग
कबीर,रहीम को
लिखना है तो
वो बात लिखो
जो सब को समझ
आ जाए
पढ़ा नहीं साहित्य
जिसने
वो भी समझ जाए
ऐसा लिखना पढ़ना
किस काम का
ना जोड़ सके कोई
अपने जीवन से
ना काम किसी
के आए
13-02-2012
164-75-02-12