Sunday, October 7, 2012

मैं कबीर बनना चाहता हूँ



मैं कबीर बनना
चाहता हूँ
सीधे सपाट शब्दों में
अपनी बात दुनिया तक
पहुचाना चाहता हूँ
कोई पुरूस्कार ना मिले
कोई किताब ना छपे
कुछ फर्क नहीं पडेगा
मुझ को पढने वाले
मेरी बात समझ ले
बस इतनी सी तमन्ना
रखता हूँ
आत्म संतुष्टी के
लिखता हूँ
अगर भला किसी का
हो जाए
दो पल भी खुश हो जाए 
उसे ही पुरूस्कार
समझता हूँ
767-12-07-10-2012
कबीर 

1 comment:

Anita said...

किसी को खुशी पहुँचाना...पुरस्कार से कम है क्या ?
बहुत अच्छे विचार !
~सादर !