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Tuesday, March 26, 2013

अरसे बाद घर की छत पर एक परिंदा नज़र आया



अरसे बाद
घर की छत पर
एक परिंदा नज़र आया
उससे पूछ लिया
आज कल परिंदों का
शहर की ओर आना कम
क्यों हो गया?
परिंदे ने आश्चर्य से देखा
फिर सहमते हुए बोला
तुम इंसान हो कर
ऐसा कह रहे हो
लगता है तुम में
अभी इंसानियत बची है
इसलिए
यह प्रश्न पूछ रहे हो
मैं मन से नहीं आया
मेरे दादा से
शहर के किस्से सुने
तो रहा नहीं गया
मैं भी शहर देखने
आ गया
अब डर रहा हूँ
इंसान की नज़रों में
आने के बाद
क्या लौट भी पाऊंगा
या मेरे हज़ारों
रिश्तेदारों जैसे
किसी इंसान का
शिकार हो कर
शहर में ही जान
दे दूंगा
47-47-26-01-2013
प्रकृति,पक्षी,परिंदे,पर्यायवरण,जीव जंतु
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Friday, March 22, 2013

आज तक मनुष्य को नहीं समझ पायी



शहर में गोरिय्या का
बुरा हाल हो गया है
किसी पेड़ पर कोई
बसेरा नहीं बनाने देता
किसी घर में खुशी से
कोई आने नहीं देता
भूले से पहुँच भी जाए
तो भगा दी जाती
गुलेल से
जान बच भी जाए
तो बहेलियों के जाल में
फंस जाती
जीने की इच्छा लिए
निरंतर
मौत का सामना करती
अंतिम क्षण तक हार
नहीं मानती
जीवन दुरूह होता है
यह तो समझ गयी
पर आज तक मनुष्य को
नहीं समझ पायी
40-40-22-01-2013
गोरिय्या, मनुष्य, प्रकृति,पर्यावरण,पक्षी,चिड़िया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Monday, March 5, 2012

कहने को छोटी सी चिड़िया थी

एक एक तिनका
जोड़ कर बनाया था
नीड़ उसने
बहुत परिश्रम से
बसने से पहले ही
हवा के तेज झोंके ने
कर दिया बेसहारा उसे
समझ ना पायी
कैसे हो गयी घर से
बेघर एक क्षण में
ना आँसू बहाए
ना व्यथित हुयी
ना ही ढिंढोरा पीटा
दुनिया में  
चुपचाप जुट गयी
तन मन,संयम से
एक एक तिनका
ढूंढ कर कर लाने लगी
पुनः नीड़ बनाने को
कहने को
छोटी सी चिड़िया थी
हिम्मत
दिखायी पहाड़ों सी
अकेली लडती रही
तूफानों से
05-03-2012
299-33-03-12