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Tuesday, September 13, 2011

पहाड़ों की रक्षा करो

दूर पहाड़ों में
टिमटिमाती बत्तियां
गगन में जगमगाते
तारों  सी दिखती
निमंत्रण देती
छोड़ दो अब
लुटी हुयी धरती  को
पैसे के लिए 
कटे हुए पेड़ों और
कंक्रीट के जंगल को
निरंतर धूल मिट्टी से
पीछा छुडाओ 
आ जाओ पहाड़ों में
बादलों से
अठखेलियाँ करो
ठंडी,ताज़ी हवा के
झोके खाओ
मन के गीत गाओ
पंछियों से बातें करो
प्रकृति की गोद में
जीवन बिताओ
जो नहीं कर सके
धरती पर
वो पहाड़ों में करो
इश्वर के वरदान का
सम्मान करो
धन लोलुप इंसानों से
13-09-2011
1498-70-09-11

Tuesday, July 12, 2011

मेरे पास 
एक दिल है
एक मन भी है
 मैं भी व्यथित 
होता हूँ
निरंतर रोता हूँ
हंसता हूँ
कभी बहकता हूँ
आखिर तो इंसान हूँ
पहाड़ जितना 
कठोर नहीं हूँ
किसी बात का कोई
असर नहीं हो
ऐसा संभव भी नहीं है
ना ही उसके जैसे
बिना भावनाओं के हूँ
दिए की लौ सा
टिमटिमाता हूँ
कभी कांपता हूँ
जब तक जीवन है
 ज़िंदा हूँ
12-07-2011
1173-56-07-11