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Tuesday, September 27, 2011

भीड़ से घिरा हूँ

भीड़ से घिरा हूँ
फिर भी अकेला हूँ 
साथ में हंसता हूँ 
अकेले में रोता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
निरंतर खुशी का 
दिखावा करता हूँ 
वक़्त से लड़ता हूँ
ज़ुबां चुप रखता हूँ
लिख कर कहता हूँ
मन में खुश होता हूँ
कल के लिए खुद को
तैयार करता हूँ
सुबह फिर भीड़ से
घिरा होता हूँ 
27-09-2011
1574-1405-,09-11

Tuesday, July 12, 2011

मेरे पास 
एक दिल है
एक मन भी है
 मैं भी व्यथित 
होता हूँ
निरंतर रोता हूँ
हंसता हूँ
कभी बहकता हूँ
आखिर तो इंसान हूँ
पहाड़ जितना 
कठोर नहीं हूँ
किसी बात का कोई
असर नहीं हो
ऐसा संभव भी नहीं है
ना ही उसके जैसे
बिना भावनाओं के हूँ
दिए की लौ सा
टिमटिमाता हूँ
कभी कांपता हूँ
जब तक जीवन है
 ज़िंदा हूँ
12-07-2011
1173-56-07-11

Friday, April 1, 2011

संतुष्ट

खजूर का पेड़
आंसू बहा रहा था
जोर से चिल्ला रहा था
फल देता हूँ ,बाकी पेड़ों से लंबा हूँ
पर घना नहीं हूँ
मेरी छाया में कोई नहीं बैठता
आंसूं की बूँदें
पास लगे अमरुद के पेड़ पर गिरी
अमरुद के पेड़ ने ऊपर देखा
खजूर की बात सुन कर बोला
मेरा दुःख तुम से ज्यादा है
मैं भी फल देता ,फिर भी पत्थर खाता
मेरे कच्चे फल भी तोड़े जाते
बच्चे मुझे परेशान करते
उनकी बात पेड़ पर चढी
चमेली की बेल सुन रही थी
वो भी सिसकियाँ ले कर कहने लगी
सुन्दर महकते फूल देती हूँ
फिर भी बिना सहारे के नहीं चढ़ सकती
नज़दीक सदा बहार का पौधा
तीनों की बात सुन कर
हँसते हँसते कहने लगा
मेरी भी सुन लो
पौधा मेरा कोई शौक से नहीं लगाता
ना मैं औरों सा महकता
मेरे बीज उड़ कर बगीचों में पहुँचते
जहां गिरते लग जाते
पौधा साल भर फूल देता रहता
निरंतर खुश रहता
अपने को खुश किस्मत समझता
सुन्दर बाग़,बगीचों में बसता
गुलाब,मोगरा,चमेली के संग रहता
निरंतर संतुष्ट रहता
इसी लिए सदा हंसता रहता
01-04--11
572—05-04-11