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Thursday, November 10, 2011

भीड़ से घिरा हूँ फिर भी अकेला हूँ


भीड़ से घिरा हूँ
फिर भी अकेला हूँ
बिना आवाज़ का
साज़ हूँ
किसी अपने की 
तलाश में भटक
रहा हूँ
निरंतर अँधेरे में
उजाला
ज़िन्दगी में
सुर ढूंढ रहा हूँ
कोई समझ सके
मुझको
ऐसा दोस्त खोज
रहा हूँ
09-11-2011
1765-33-11-11

Tuesday, September 27, 2011

भीड़ से घिरा हूँ

भीड़ से घिरा हूँ
फिर भी अकेला हूँ 
साथ में हंसता हूँ 
अकेले में रोता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
निरंतर खुशी का 
दिखावा करता हूँ 
वक़्त से लड़ता हूँ
ज़ुबां चुप रखता हूँ
लिख कर कहता हूँ
मन में खुश होता हूँ
कल के लिए खुद को
तैयार करता हूँ
सुबह फिर भीड़ से
घिरा होता हूँ 
27-09-2011
1574-1405-,09-11

Friday, August 19, 2011

पता नहीं मिलेंगे या नहीं ?

भी आ रहे हैं
दूर खड़े
मुस्करा भी रहे हैं
इशारा भी कर
रहे हैं
पता नहीं
मिलेंगे या नहीं ?
या मरीचिका सा 
लुभाएँगे
ख्वाईशें जगायेंगे
करीब जाने पर
लुप्त हो जायेंगे
सदा की तरह
अकेला  
रह जाऊंगा
19-08-2011
1384-106-08-11

Monday, July 18, 2011

बीते कल को दफ़न करने में लगा हूँ

मोहब्बत में खो
गया था
खुद को  भूल
गया था
जब होश आया तो
लुट चुका था
बिलकुल अकेला था
बेवफायी में बिखर
गया था
अब खुद को
समेटने की कोशिश में
लगा हूँ
निरंतर बीते कल को
दफ़न करने में
लगा हूँ
18-07-2011
1203-83-07-11