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Tuesday, September 27, 2011

भीड़ से घिरा हूँ

भीड़ से घिरा हूँ
फिर भी अकेला हूँ 
साथ में हंसता हूँ 
अकेले में रोता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
निरंतर खुशी का 
दिखावा करता हूँ 
वक़्त से लड़ता हूँ
ज़ुबां चुप रखता हूँ
लिख कर कहता हूँ
मन में खुश होता हूँ
कल के लिए खुद को
तैयार करता हूँ
सुबह फिर भीड़ से
घिरा होता हूँ 
27-09-2011
1574-1405-,09-11

Sunday, September 18, 2011

जो भी हँस के मिला,उसे गले लगाता रहा

उसे गले लगाता रहा
दिल उसी को देता रहा 
हर लम्हा सहारा दिया
मंजिल उसे मान  लिया
उसेके ग़मों को निरंतर 
खुद का समझता रहा
खुद चुपचाप सहता रहा
उसे हमेशा हँसाता रहा
किस बात से  रुसवा हुए
पता भी ना चलने दिया
हसरतों की किश्ती  को
मंझधार में छोड़ दिया
मरने से पहले ही कई
बार दोजख देख लिया
19-09-2011
1524-95-09-11

Monday, July 11, 2011

कागज़ का टुकडा नहीं हूँ

कागज़
का टुकडा नहीं हूँ 
लिखा और फाड़ दिया
धडकते दिल का
मालिक हूँ
निरंतर
मोहब्बत को तरसता हूँ
मोहब्बत में जीता हूँ 
जिसका हो गया
एक बार
उसी का रहता हूँ
पुचकारे ये दुत्कारे
शौक से सहता हूँ
11-07-2011
1162-46-07-11