भीड़ से घिरा हूँ
फिर भी अकेला हूँ
साथ में हंसता हूँ
अकेले में रोता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
निरंतर खुशी का
दिखावा करता हूँ
वक़्त से लड़ता हूँ
ज़ुबां चुप रखता हूँ
लिख कर कहता हूँ
मन में खुश होता हूँ
कल के लिए खुद को
तैयार करता हूँ
सुबह फिर भीड़ से
घिरा होता हूँ
27-09-2011
1574-1405-,09-11
उसे गले लगाता रहा
दिल उसी को देता रहा
हर लम्हा सहारा दिया
मंजिल उसे मान लिया
उसेके ग़मों को निरंतर
खुद का समझता रहा
खुद चुपचाप सहता रहा
उसे हमेशा हँसाता रहा
किस बात से रुसवा हुए
पता भी ना चलने दिया
हसरतों की किश्ती को
मंझधार में छोड़ दिया
मरने से पहले ही कई
बार दोजख देख लिया
19-09-2011
1524-95-09-11
कागज़
का टुकडा नहीं हूँ
लिखा और फाड़ दिया
धडकते दिल का
मालिक हूँ
निरंतर
मोहब्बत को तरसता हूँ
मोहब्बत में जीता हूँ
जिसका हो गया
एक बार
उसी का रहता हूँ
पुचकारे ये दुत्कारे
शौक से सहता हूँ
11-07-2011
1162-46-07-11