Showing posts with label चुपचाप. Show all posts
Showing posts with label चुपचाप. Show all posts

Thursday, February 23, 2012

क्षणिकाएं -16


जीना
सोचता रहता हूँ
जो मन कहता
लिखता रहता हूँ
निरंतर
इसी तरह जीता
जाता हूँ
फर्क
नींद खुल गयी
सपना टूट गया
क्या फर्क पडा
वैसे भी टूटता
चुपचाप
या तो हँसो
या मुस्काराओ
रोओ मत
चुपचाप सहते रहो
बोलो मत
अच्छा-बुरा
कौन अच्छा ?
कौन बुरा ?
उम्र गुजर गयी
अभी तक तो
पता नहीं चला
दोहे
जब छोटे
दोहे कहते हैं बड़ी बातें
तो क्यों लिखूं लम्बी
 कवितायें
डर
डरनेवालों को
डराते हैं लोग
हिम्मत
रखने वालों से
घबराते हैं लोग
23-02-2012
231-142-02-12

Sunday, September 18, 2011

जो भी हँस के मिला,उसे गले लगाता रहा

उसे गले लगाता रहा
दिल उसी को देता रहा 
हर लम्हा सहारा दिया
मंजिल उसे मान  लिया
उसेके ग़मों को निरंतर 
खुद का समझता रहा
खुद चुपचाप सहता रहा
उसे हमेशा हँसाता रहा
किस बात से  रुसवा हुए
पता भी ना चलने दिया
हसरतों की किश्ती  को
मंझधार में छोड़ दिया
मरने से पहले ही कई
बार दोजख देख लिया
19-09-2011
1524-95-09-11

Saturday, July 9, 2011

जैसे भी होगा जीते रहेंगे

हालात को मंज़ूर
कर लिया
अब रास्ता ये ही
चुन लिया
खामोशी से सब 
देखते रहेंगे
चुपचाप सहते रहेंगे
ना प्रतिरोध करेंगे
ना विरोध की 
बात करेंगे
दिए की मंद हुयी
रोशनी को
बुझने ना देंगे
कम में संतोष करेंगे
निरंतर हँसते रहेंगे
जैसे भी होगा जीते
रहेंगे
09-07-2011
1158-42-07-11