जीना
सोचता रहता हूँ
जो मन कहता
लिखता रहता हूँ
निरंतर
इसी तरह जीता
जाता हूँ
फर्क
नींद खुल गयी
सपना टूट गया
क्या फर्क पडा
वैसे भी टूटता
चुपचाप
या तो हँसो
या मुस्काराओ
रोओ मत
चुपचाप सहते रहो
बोलो मत
अच्छा-बुरा
कौन अच्छा ?
कौन बुरा ?
उम्र गुजर गयी
अभी तक तो
पता नहीं चला
दोहे
जब छोटे
दोहे कहते हैं बड़ी बातें
तो क्यों लिखूं लम्बी
कवितायें
डर
डरनेवालों को
डराते हैं लोग
हिम्मत
रखने वालों से
घबराते हैं लोग
23-02-2012
231-142-02-12
उसे गले लगाता रहा
दिल उसी को देता रहा
हर लम्हा सहारा दिया
मंजिल उसे मान लिया
उसेके ग़मों को निरंतर
खुद का समझता रहा
खुद चुपचाप सहता रहा
उसे हमेशा हँसाता रहा
किस बात से रुसवा हुए
पता भी ना चलने दिया
हसरतों की किश्ती को
मंझधार में छोड़ दिया
मरने से पहले ही कई
बार दोजख देख लिया
19-09-2011
1524-95-09-11
हालात को मंज़ूर
कर लिया
अब रास्ता ये ही
चुन लिया
खामोशी से सब
देखते रहेंगे
चुपचाप सहते रहेंगे
ना प्रतिरोध करेंगे
ना विरोध की
बात करेंगे
दिए की मंद हुयी
रोशनी को
बुझने ना देंगे
कम में संतोष करेंगे
निरंतर हँसते रहेंगे
जैसे भी होगा जीते
रहेंगे
09-07-2011
1158-42-07-11