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Saturday, February 11, 2012

ना ग़मों से दुश्मनी ना सुकून से दोस्ती

ना ग़मों से दुश्मनी
ना सुकून से दोस्ती
यही क्या कम है
ज़िंदा हूँ अब तक
कलम मेरी
अब भी रोशन
लिखती है सच
कहती है बात मन की
बताती है
फितरत लोगों की 
दिखाती है
हकीकत रिश्तों की
कैसे किसी को पसंद
आऊँगा?
कैसे मिलेगा सुकून?
दोस्ती ग़मों से 
ही होगी
गर लिखूंगा सच सच
11-02-2012
154-65-02-12

Sunday, September 18, 2011

जो भी हँस के मिला,उसे गले लगाता रहा

उसे गले लगाता रहा
दिल उसी को देता रहा 
हर लम्हा सहारा दिया
मंजिल उसे मान  लिया
उसेके ग़मों को निरंतर 
खुद का समझता रहा
खुद चुपचाप सहता रहा
उसे हमेशा हँसाता रहा
किस बात से  रुसवा हुए
पता भी ना चलने दिया
हसरतों की किश्ती  को
मंझधार में छोड़ दिया
मरने से पहले ही कई
बार दोजख देख लिया
19-09-2011
1524-95-09-11