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Tuesday, May 29, 2012

श्रेष्ठ होने का अहम्


आज सूनी पगडंडी भी
मुझ पर हँस रही थी
किनारे लगे पेड़
आश्चर्य से देख रहे थे
पेड़ पर बैठी कोयल भी
क्रोध में
जोर से कूंकने लगी
मानो सब मुझे अहसास
कराना चाहते थे
तुम्हारे बिना मेरा कोई
अस्तित्व नहीं है
भावना हीन
हाड़ मांस के पुतले से
अधिक नहीं हूँ
मात्र पुरुष होने के कारण
तुमसे श्रेष्ठ होने का अहम्
चूर चूर हो गया
मुझे सत्य का पता चल गया
पती पत्नी में ना कोई
श्रेष्ठ होता
ना ही निकृष्ट होता
एक में कमी की पूर्ती
दूसरा करता
अब लौट कर आ जाओ
मुझे प्रायश्चित करने में
सहयोग दो
तुम्हारे बिना वह भी
ठीक से नहीं कर पाऊंगा
29-05-2012
542-62-05-12

Monday, March 28, 2011

प्रायश्चित



आज परीक्षा का
नतीजा आ गया ,
वो अब डाक्टर बन गया
घर पहुंचा,उम्मीद थी पिता
वादे के अनुसार,उसकी पसंद की
कार भेंट करेंगे
पिता ने गले से लगाया
रंग बिरंगे कागज़ का,लिफाफा दिया
उस में बंद किताब पढने को कहा
उस का चेहरा,क्रोध से लाल हो गया
बिना बात करे ,
सामान ले घर से निकल गया
दूर किसी शहर में बस गया
माँ बाप से रिश्ता तोड़ दिया
बरसों बाद उसे
अपने शहर जाने का मौक़ा मिला
अपना घर देखने का मन हुआ
वहाँ पहुंचा तो देखा,कोई और रह रहा था
परिचय देने पर,
उस शख्श ने बताया,
पिता ने मरने से पहले मकान
उसे बेच दिया ,
कभी उससे मुलाक़ात होने पर
ये लिफाफा देने का वचन लिया
उसने लिफाफा खोला
उसमें पिता की वसीयत थी ,
सारा पैसा उस के नाम किया था ,
सहनशील कैसे बनें ?
शीर्षक की किताब थी
साथ ही कार कम्पनी की रसीद थी
जिस पर बीस वर्ष पहले की तारीख थी
उसे याद आया ,
उस दिन डाक्टरी की परीक्षा का
नतीजा निकला था
उसकी आँखों से आंसूं बहने लगे
पिता ने वादा पूरा किया था
उसे सहनशीलता का महत्त्व
समझाना चाहते थे
इस लिए उन्होंने पहले उसे किताब
पढने को कहा
अपनी मूर्खता पर पछताने लगा
अब सब को सहनशीलता का
महत्त्व बताता
खुद से हुयी गलती कभी नहीं छुपाता
निरंतर प्रायश्चित करता रहता
28-03-03
530—200-03-11