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Friday, November 11, 2011

कभी हम खुद को ही बहला लिया करते


कभी हम खुद को ही
  बहला लिया करते
शीशे में
 अपना अक्स देख कर
खूब मुस्कराया करते
अपने
खूबसूरत चेहरे पर
इतराया करते
जो खुले आम नहीं
कह पाते
निरंतर अकेले में
कह लिया करते
खुद की नादानियों पर
खुद को
डांट दिया करते
चाहने वालों को
 ख़्वाबों में देख लिया
करते
दिल के अरमान
ख़त में लिख कर
खुद ही पढ़ लिया करते
कभी हम खुद को ही
  बहला लिया करते
11-11-2011
1775-43-11-11

Tuesday, July 26, 2011

वो आज कल बातों से बहलाते

वो आज कल

बातों से बहलाते

किसी तरह पीछा

छुडाते

समझते हम हकीकत

ना जानते

हम भी रंजो गम में

वक़्त गुजारते

निरंतर उन्हें बहलाने को

बात करते

वक़्त बदल जाने का

इंतज़ार करते

26-07-2011

1236-116-07-11