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Saturday, December 15, 2012

ये कैसा वक़्त हैं दोस्तों



ये कैसा वक़्त हैं दोस्तों
कुछ दोस्त रह गए
कुछ चले गए दोस्तों
काफिले बनते रहे
काफिले 
बिगड़ते गए दोस्तों
खुल कर 
हँस भी नहीं सके
कि रोने लगे दोस्तों
हम भी कब तक रहेंगे
पता नहीं दोस्तों
हमारे जाने के बाद
रोना नहीं दोस्तों
हँसते हुए हमारे जैसे ही
दोस्तों के काफिले
बनाते रहना दोस्तों
961-80-15-12-2012
दोस्त,काफिले,वक़्त,शायरी,

Thursday, October 25, 2012

कभी होता था बुलंदी पर



आज गुमनामी में
ज़िन्दगी गुजार रहा है
चमकता था आकाश में
सूरज की तरह
आज वक़्त के बादलों के
पीछे छुपा हुआ है
वक़्त इकसार नहीं रहता
अब जान गया है
अगर नहीं चढ़ता
गरूर दिमाग में
वक़्त की
चाल पहचान लेता
हर एक से हँस कर
मिलता रहता
आज अकेले बैठा
आसूं नहीं बहा रहा होता
800-42-25-10-2012
गुमनामी,बुलंदी,वक़्त,समय,

Saturday, May 12, 2012

क्या कहूँ ज़माने को

क्या कहूँ ज़माने को
ज़माना तो
अपनी चाल चलेगा
उगते सूरज को
सलाम  करेगा
डूबते को अँधेरे में
धकेलेगा
हँसते के साथ हंसेगा
रोते को रुलाएगा
किसका हुआ है ज़माना
जो अब मेरा होगा
खुद को ही सहना
होगा
खुद को ही लड़ना
होगा
यूँ ही जीना होगा
12-05-2012
516-30-05-12

Friday, April 13, 2012

हंसने से पहले ही .........


हँसने से पहले ही
रोना पड़ता
सर पर रखा हाथ ही
गला दबाने लगता
ठीक होने से पहले
चारागर ही ज़ख्म
फिर हरे कर देता
ज़िन्दगी में अब तक
कोई चारागर ना मिला
जो ज़ख्मों को ठीक कर दे
फिर भी हारा नहीं हूँ
तलाश करता रहूँगा
वक़्त काटता रहूँगा
12-04-2012
435-15-04-12
चारागर =चिकत्सक

Sunday, March 18, 2012

ज़िन्दगी में पहले सी रवानी नहीं होगी

वक़्त से पहले ही 
साथी के साथ
सफ़र अधूरा रह गया
यादें सहारा,
रोना साथी,बन गया
वक़्त के साथ
ये घड़ी भी कभी
गुजरेगी
फिर भी यादें
दिल दिमाग पर
दस्तक देती रहेंगी
चैन से
रहने नहीं देगी
अकेलापन कचोटेगा
बहारों में सुगंध
ज़िन्दगी में पहले सी
रवानी नहीं होगी,
18-03-2012
403-137-03-12

Thursday, December 15, 2011

जब देख ही लिया,ज़रा सा मिल भी लो


जब देख ही लिया
ज़रा सा मिल भी लो
चंद बातें हम से भी कर लो
आँखों को दी राहत तुमने
थोड़ी सी दिल को भी दे दो
वक़्त मुश्किल से गुजरता
सारा जहां दोजख सा लगता
थोड़ा सा वक़्त ज़न्नत में 
गुजारने दो
एक अहसान और कर दो
चंद यादें ऐसी भी दे दो
जिनके सहारे ज़िन्दगी
सुकून से काट लें
15-12-2011
1862-30-12

Saturday, December 10, 2011

गुजरे वक़्त का जब भी ख्याल आये


वक़्त का जब भी
ख्याल आये
उजड़े चमन में बहार
आये
सूखे लबों पे मुस्कान
छाये
यादों में खो जाऊं
दर्द सारे भूल जाऊं
हसरतों की दुनिया में
लौट जाऊं
ज़िंदा रहने की 
ख्वाइश करने लगूं
10-12-2011
1851-19-12

Friday, November 11, 2011

वक़्त इतना बेरहम क्यूं हो गया ?


वक़्त इतना
बेरहम क्यूं  हो गया?
क्यूं ठहर गया?
खुदा जाने
दुआ भी करता हूँ ,
इबादत भी करता हूँ
फिर क्यों नहीं सुनता?
खुदा जाने
कब तक करेगा हैरान
मर मर कर जिलाएगा
खुदा जाने
कब तक रुलाएगा
कब चेहरे पर मुस्कान
 लाएगा
खुदा जाने
निरंतर सब्र रख रहा हूँ
सब्र का सिला देगा या नहीं
खुदा जाने
कब तक इम्तहान लेगा
यकीं उस पर बरकरार रखेगा
खुदा जाने
कब तक मेरी नियत ना
समझेगा
मुझे ना पहचानेगा 
पहचानेगा ज़रूर एक दिन
कब पहचानेगा ये भी
खुदा जाने
11-11-2011
1774-42-11-11

Wednesday, November 2, 2011

सुबह नौ बजे


सुबह नौ बजे का
वक़्त
मुझे काटने को
दौड़ता है
यही वक़्त तो था
जब उनका
मेरे घर के सामने से
गुजरना होता था
निरंतर मुस्कारहटों
का आदान प्रदान
होता था
यही वक्त तो था
जब मेरी तरफ
देखते हुए
उन्हें ख्याल ना रहा
उनका पैर फिसल
गया
बस ने उन्हें कुचल
दिया
मेरे हाथों में उन्होंने
दम तोड़ा
नौ बजे का वक़्त
क्यों आता है ?
इसके आने से पहले ही
दिल धड़कने लगता है
नौ बजे का वक़्त
मुझे काटने को
दौड़ता है
01-11-2011
1735-04-11-11

Monday, October 17, 2011

वक़्त का तकाजा है


वक़्त का तकाजा है
जो जैसा कर रहा
उसे वैसा करने दो
कातिलों को क़त्ल
फितरत मंदों को
फितरत पूरी करने दो
उनके शौक में खलल
ना डालो
चुपचाप सह लो
चुपचाप सुन लो
खामोशी से देख लो
रोना हो तो चुपके से
रोलो
जुबान खोली तो
ज़लज़ला आ जाएगा
हर बात का फ़साना
बन जाएगा
मुट्ठी भर अमन का
मंजर
ग़मों के ढेर में बदल
जाएगा
निरंतर दिलों में लगी
आग को कोई
बुझाने वाला ना
मिलेगा
17-10-2011
1666-74-10-11