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Saturday, May 12, 2012

क्या कहूँ ज़माने को

क्या कहूँ ज़माने को
ज़माना तो
अपनी चाल चलेगा
उगते सूरज को
सलाम  करेगा
डूबते को अँधेरे में
धकेलेगा
हँसते के साथ हंसेगा
रोते को रुलाएगा
किसका हुआ है ज़माना
जो अब मेरा होगा
खुद को ही सहना
होगा
खुद को ही लड़ना
होगा
यूँ ही जीना होगा
12-05-2012
516-30-05-12

Friday, July 22, 2011

हसने वालों को भी कभी रोना होगा

कोई तो मेरा साथ दो

मेरे गम में आंसू बहाओ

मैं हंस रहा था

तब सब हंस रहे थे

अब क्यों मुंह छिपा रहे ?

मुझे पता नहीं था

दस्तूर ज़माने का निबाह रहे

हैरान हूँ

अब क्यों इंसान

इंसानियत नहीं निभाते

क्या रिश्ते

इतने कमज़ोर होते ?

कच्चे धागे से टूटते

ज़रुरत के हिसाब से चलते

वक़्त सदा

इकसार नहीं रहता

क्यूं लोग निरंतर भूलते ?

हसने वालों को भी कभी

रोना होगा

जीवन का हर रंग

देखना होगा

22-07-2011

1216-96-07-11

Wednesday, June 22, 2011

खुशियों में होता है,शामिल सारा ज़माना

खुशियों में होता है,
शामिल सारा ज़माना
गम में नज़र आता नहीं
कोई चेहरा पुराना
हंसता था जब तक
हंसता था,हर साथ वाला
रोने का वक़्त है,
कोई नहीं अब साथ
रोने वाला
बहते पानी में
हर शख्श नाहता
डूबते का नहीं होता
कोई सहारा
मोहब्बत का जवाब
निरंतर नफरत से देना
रिवाज़ पुराना
मतलब अपना साधना
धंधा पुराना
22-06-2011
1084-111-06-11