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Thursday, October 25, 2012

कभी होता था बुलंदी पर



आज गुमनामी में
ज़िन्दगी गुजार रहा है
चमकता था आकाश में
सूरज की तरह
आज वक़्त के बादलों के
पीछे छुपा हुआ है
वक़्त इकसार नहीं रहता
अब जान गया है
अगर नहीं चढ़ता
गरूर दिमाग में
वक़्त की
चाल पहचान लेता
हर एक से हँस कर
मिलता रहता
आज अकेले बैठा
आसूं नहीं बहा रहा होता
800-42-25-10-2012
गुमनामी,बुलंदी,वक़्त,समय,

Wednesday, May 30, 2012

बुढापा ऐसा ही होता है


पुराने पेड़ को देखा तो
किसी बूढ़े सा नज़र आया
मोटा तना उम्र बता रहा था
कम डालियाँ,कम पत्ते
समय की कहानी दर्शा रहे थे
ऐसा लगा बूढा शरीर
बिना वस्त्राभूषण मजबूरी में
जिए जा रहा हो
गौर से देखा
कोई घोंसला तो नहीं दिखा
दो तीन पक्षी अवश्य दिखे
जिन्होंने बसेरे तो किसी
पत्तियों से भरे पेड़ पर
बसा लिए
ऐसा प्रतीत हुआ
पुराने रिश्ते निभाने आये हैं
मैं समझ गया
पक्षियों को भी पता चल गया
अब पेड़ के  जाने का समय
आ गया है
जाते जाते मिलने की
रस्म पूरी करते रहो
थोड़ी बहत खुशी देते रहो
द्रश्य को देख कर
मुझे ध्यान आया
बुढापा ऐसा ही होता है
बहुत कम संगी साथी
शरीर बीमार,
अपनों की कमी
कभी कोई मिलने आ जाए
तो ह्रदय खुशी से भर जाए
नहीं तो अकेले ठूंठ से
खड़े रहो
समय काटते रहो
संसार से जाने का
इंतज़ार करते रहो
30-05-2012
545-65-05-12

समय के साथ

समय के साथ
उम्र बढ़ती
सोच बदलता
रिश्ते बनते बिगड़ते
नए अनुभव
नए अहसास होते
अच्छे बुरे का पता
चलता
नहीं बदलती तो
फितरत नहीं बदलती
बढ़ती उम्र के साथ
अपनी फितरत भी
बदल दो
ज़िन्दगी को कुछ
अच्छे पल दे दो
अनुभव को सार्थक
 कर दो
30-05-2012
543-63-05-12

Saturday, December 3, 2011

मेरे कमरे में लगा आईना


वर्षों से मेरे कमरे में
लगा आईना 
बड़ा ही पुरातन वादी है
बदलने का नाम ही नहीं लेता
निरंतर मुझे वैसे ही दिखाता
जैसा में दिखता हूँ
सुबह आधी नींद से उठ कर
बाल ठीक करने के लिए 
आइना  देखता हूँ
तो बिखरे हुए बाल
अलसाई आँखें
चेहरे पर नींद की खुमारी
साफ़ दिखा देता है
आधी नींद  से सो कर उठा हूँ
कभी बन ठन कर
आईने  में झांकता हूँ
तो  चिल्ला कर कह देता है
कहीं जाने की तैय्यारी में हूँ
मैं सोचता हूँ
क्यों ये बिखरे बाल और
चेहरे की झुर्रियों को
नहीं छुपाता ?
बड़ा ही रुढीवादी है
इक्कीसवीं सदी में भी
नहीं बदला
शायद समय के साथ
चलना नहीं चाहता
चेहरे पर चेहरा नहीं
लगाता
सच कह देता है
वर्षों से मेरे कमरे में
लगा आइना 
03-12-2011
1836-101-11-11

Thursday, September 29, 2011

समय नहीं मिला

बहुत आसानी से
कह दिया
समय नहीं मिला
बहुत कठिन होता
कहना
करने की इच्छा नहीं
ह्रदय को भाया नहीं
मन निश्चित ना
कर सका
निरंतर वो सब
करता रहा
जो मन को भाता रहा
अनावश्यक कार्यों में
लिप्त होता रहा
समय व्यर्थ करता रहा
सदा झूठ बोलता रहा
स्वयं को
खुश करता रहा
झूठ से बच सकता था
फिर भी 
सदा  कहता रहा
समय नहीं मिला
29-09-2011
1582-153-,09-11

Saturday, July 16, 2011

जीवन का अंतिम समय आ गया था

सांस लेने में निरंतर
कठिनायी हो रही थी
आँखें बार बार
बंद हो रही थी
दृष्टि भी मंद हो गयी
जुबान काँप रही थी
मुख से अस्पष्ट स्वर
निकल रहे थे
हाथ उठाने की कोशिश
 करता
हिल कर रह जाता
पास खड़े लोगों को
पहचानने का प्रयत्न करता
विफल होता
दिमाग पर जोर डालता
क्यों ऐसा हो रहा ?
समझ नहीं पा रहा था
चेहरा भावहीन
चिंतामुक्त था
शरीर जवाब दे रहा था
उसे पता नहीं था
आ गया था
अपनों से बिछड़ने का
संसार से जाने का
समय हो गया था
16-07-2011
1191-73-07-11