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Thursday, February 9, 2012

परमात्मा से देखा ना गया


संसार में आने को
बहुत मचल रहा था
परमात्मा से देखा ना गया
उसे संसार में अतिथी
बना कर भेज दिया
जाने से पहले उसे
समझाया
सबसे मिल कर रहना
ना किसी से झगडा करना
ना ह्रदय में बैर रखना
जब तक रहना
प्यार मोहब्बत से रहना
घ्रणा से दूर रहना
अगर अच्छे अतिथी
बन कर रहोगे
स्वर्ग में जगह पाओगे
दुनिया में आते ही
चका चौंध में सारा पाठ
भूल गया
संसार को अपनी
मिलकियत समझने लगा
होड़ के भंवर में फंस गया
निरंतर
आगे बढ़ने की चाह में
बैर और घ्रणा से जीने लगा
जीवन भर उलझता रहा
ना उसकी इच्छाएं पूरी हुयी
ना पाने की इच्छा कम हुयी
चैन,संतुष्टी कभी ना मिली
दुनिया से जाने का
समय आया तो
परमात्मा याद आने लगा
नरक का डर सताने लगा
परमात्मा से
क्षमा की आशा में
निरंतर मंदिर मस्जिद के
चक्कर लगाते लगाते
एक दिन संसार से
असंतुष्ट विदा हो गया
कभी किसी ने सम्मान से
उसका नाम नहीं लिया
09-02-2012
132-43-02-12  

Sunday, September 11, 2011

अनुत्तरित प्रश्न

हवा कभी मंद
कभी त्वरित
गति से चलती
कभी ठहर जाती
वर्षा कभी सपना
बनती
कभी रुकती नहीं
धूल कभी गुबार
बनती
कभी चुपके से
ज़म जाती
जो सब कराता
जिसके
हाथ में है डोर
वो कभी दिखता
नहीं
एक रहस्य जो
कभी उजागर
होता नहीं
फिर भी सब
उस शक्ती को
आशा और विश्वास से
नमन करते रहते
निरंतर उसे ढूंढते
रहते
वो कभी किसी को
दिखता नहीं
किसी से मिलता नहीं
फिर भी सब
उसकी डोर से
बंधे रहते
वो है भी या नहीं
निरंतर प्रश्न करते
रहते
जीवन भर
अनुत्तरित रहते
एक दिन
संसार से विदा
ले लेते
11-09-2011
1484-56-09-11

Saturday, July 16, 2011

जीवन का अंतिम समय आ गया था

सांस लेने में निरंतर
कठिनायी हो रही थी
आँखें बार बार
बंद हो रही थी
दृष्टि भी मंद हो गयी
जुबान काँप रही थी
मुख से अस्पष्ट स्वर
निकल रहे थे
हाथ उठाने की कोशिश
 करता
हिल कर रह जाता
पास खड़े लोगों को
पहचानने का प्रयत्न करता
विफल होता
दिमाग पर जोर डालता
क्यों ऐसा हो रहा ?
समझ नहीं पा रहा था
चेहरा भावहीन
चिंतामुक्त था
शरीर जवाब दे रहा था
उसे पता नहीं था
आ गया था
अपनों से बिछड़ने का
संसार से जाने का
समय हो गया था
16-07-2011
1191-73-07-11