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Thursday, March 14, 2013

ऐ दोस्त .....



ऐ दोस्त
हमारी छोटी सी खता को
तुमने दिल में उतार लिया
हमें दिल से ही निकाल दिया
हम दिल में तुम्हारे जैसी
तल्खी तो नहीं रखते
मलाल सिर्फ इस बात का है
तुमने ये भी नहीं बताया
 हमारी खता क्या है
इक बार हमारे दिल में
झाँक कर देखो
कमजोरियों के
चंद छोटे काँटों के अलावा
मोहब्बत के फूलों से भरा है
इंसानियत की महक से
महक रहा है
फिर भी तुम अगर
हमें गुनाहगार मानते हो
खुदा की रज़ा समझ
मंज़ूर कर लेंगे
ना आसूं बहायेंगे
ना नाराज़ होंगे
हँसते हँसते जीते रहेंगे
तुम्हारे दिल में पल रहे
नफरत के शज़र सूख जाएँ
मोहब्बत के फूल महक जाएँ
इंसान बन कर जी सको
तुम्हारे लिए खुदा से
दुआ करते रहेंगे
25-25-14-01-2013    
तल्खी,खता,शायरी,नज़्म,इंसानियत,मोहब्बत,दोस्त 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Wednesday, December 19, 2012

तेरे बगैर



आँखों के सामने
बोतल भरी शराब की
पीने का मन नहीं करता
खूबसूरत फूल खिले हैं
घर के बगीचे में
देखने का मन नहीं करता
हमें हाँसिल हैं
हर तरह की खुशहालियाँ
मगर तेरे बगैर जीने का
मन नहीं करता
972-91-19-12-2012
शायरी ,तेरे बगैर, मोहब्बत

Saturday, December 15, 2012

तुम मेरी तरफ झांकती भी हो



तुम मेरी तरफ
झांकती भी हो
मुझसे मिलना भी
चाहती हो
पर तुम्हारे मन का
दरवाज़ा
बहम के ताले में बंद है
दिल के दरीचों पर
शक की सलाखें लगी हैं
चाहते हुए भी
मिल नहीं पाती हो
अगर मेरी चाहत तुम्हें
तडपाती है
तो शक की सलाखों को
तोड़ना होगा
बहम के ताले को
खोलना होगा
नहीं तो ज़िन्दगी भर
घुट घुट कर जीना होगा
दरीचे =खिड़कियाँ
963-82-15-12-2012
बहम,शक,शायरी ,

ये कैसा वक़्त हैं दोस्तों



ये कैसा वक़्त हैं दोस्तों
कुछ दोस्त रह गए
कुछ चले गए दोस्तों
काफिले बनते रहे
काफिले 
बिगड़ते गए दोस्तों
खुल कर 
हँस भी नहीं सके
कि रोने लगे दोस्तों
हम भी कब तक रहेंगे
पता नहीं दोस्तों
हमारे जाने के बाद
रोना नहीं दोस्तों
हँसते हुए हमारे जैसे ही
दोस्तों के काफिले
बनाते रहना दोस्तों
961-80-15-12-2012
दोस्त,काफिले,वक़्त,शायरी,

सुबह बड़ी शिद्दत से सजता संवारता हूँ



सुबह बड़ी शिद्दत से
सजता संवारता हूँ
शाम तक बासी फूल सा
मुरझा जाता हूँ
मगर उसका दीदार नहीं होता
बनने संवारने में ज़िन्दगी
गुजारता हूँ
पर उम्मीद का दामन नहीं
छोड़ता हूँ
आईने को रोज़ तसल्ली देता हूँ
सब्र रखने की ताकीद करता हूँ
एक दिन मेरे चेहरे के साथ
एक खूबसूरत चेहरा भी
दिखाऊंगा
जब तक तो मुझे ही बर्दाश्त
करना पडेगा
आइना खामोशी से
मुझे सजने संवारने देता है
वो भी मेरी मजबूरी
समझता है
951-70-15-12-2012
मजबूरी,शायरी,चाहत,हसरत,अरमान,मोहब्बत ,ख्वाहिश

दर्द के खामोश समंदर



दर्द के खामोश
समंदर को
बहुत शिद्दत से
सम्हाल कर
सीने में दबा रखा है
डरता हूँ
कहीं ज़ज्बात उफन कर
बाहर ना आ जाएँ
दर्द देने वालों चेहरों को
बेनकाब ना कर दे
दुनिया को
उनकी हकीकत से
रूबरू ना करा दे
मुंह दिखाने के
लायक ही ना छोड़े
948-67-15-12-2012
शायरी,मोहब्बत,ज़ज्बात ,दर्द ,

उनको शिकायत है



मुंह से
निकली हर आह में
उनका नाम होता है
आँखों से
निकले हर अश्क में
उनकी जुदाई का दर्द
छुपा है
हर ख्वाब-ओ-ख्याल में
उनका अक्स बसा
रहता है
मगर फिर भी वो
हम से दूर रहते हैं
उनको शिकायत है
हम उन्हें
दिल से नहीं चाहते
946-65-15-12-2012
शायरी,मोहब्बत,ख्वाब-ओ-ख्याल

चाहता हूँ



चाहता हूँ
दो कदम चलूँ
मंजिल मिल जाए
मैं मुस्कराऊँ भर
लोग गले से लग जाएँ
मैं हकीकत से दूर रहूँ
जो भी चाहूँ वैसा हो जाए
ये ख्वाहिश तो हर
इन्सान की
पर खुदा की बतायी
राह पर तो चलो
कभी ये भी तो याद
आ जाए
945-64-15-12-2012 
शायरी, ख्वाहिश, हकीकत, खुदा,इश्वर,

हमने उन्हें आइना दिखा दिया



उन्होंने हमें गालियों से नवाज़ा
हम तारीफ़ समझ कर चुप रहे
उन्होंने हम पर पत्थर मारे
हमने फूल समझ कर झेल लिए
उन्होंने बेवफा कहा
हमने उन्हें आइना दिखा दिया
वो मुंह छुपा कर चल दिए
944-63-15-12-2012
शायरी,बेवफा,उम्मीद

मन कहता है



मन कहता है
कहीं कोई मेरा
अपना तो है
उम्मीद की नकाब से
ढका कोई चेहरा तो है
मिलेगा या नहीं
ये अलग बात है
आस में
ज़िंदा तो रखता है
943-62-15-12-2012
शायरी,उम्मीद

जो डरते रहे वो रोते रहे



जो डरते रहे
वो रोते रहे
जो हँसते रहे
वो चलते रहे
जो समझ गए
लुबे लुबाब ज़िन्दगी का
वो उम्र भर खुश रहे
जो नहीं समझे
वो वक़्त से
पहले ही चले गए
939-58-15-12-2012
शायरी,लुबे लुबाब ज़िन्दगी

Tuesday, December 11, 2012

बड़ा हूनर चाहिए



बड़ा हूनर चाहिए
दोस्त को दुश्मन
समझने में
हाथ में खंजर
चेहरे पर हँसी रखने में
मैं हूनर मंद नहीं हूँ
दोस्त को
दोस्त समझता हूँ
दोस्त के
रोने पर रोता हूँ
दोस्त के
हँसने पर हँसता हूँ
932-51-12-12-2012
शायरी,दोस्त,दुश्मन, हूनर

जब तुम्हारी याद सताती है



जब तुम्हारी
याद सताती है
ज़ज्बातों की नदी
उफन कर
बहने लगती है
मन के पहाड़ों की बर्फ
पिघलने लगती है
हसरतों के रेगिस्तान में
आंधी चलने लगती है
आँखें नम होने लगती हैं
ज़िन्दगी
बोझ लगने लगती है
931-50-12-12-2012
शायरी,याद,यादें,हसरत,ज़ज्बात

जब आस ख़त्म हो जाती


जब आस 
ख़त्म हो जाती
दिल टूट जाता है
मन दुखी रहता है
आसूं सूख जाते हैं
ज़िन्दगी दोजख
लगती है
जीना मौत से भी
दुश्वार लगता है
927-45-12-12-2012
शायरी,आस,दुश्वार

हम तारीफ़ करते रहे,वो सर पर चढाते रहे



हम तारीफ़ करते रहे
वो सर पर चढाते रहे
खुद को तारीफ़ का
हक़दार समझने लगे
जुबान में तल्खी
अंदाज में गरूर आ गया
जब समझाने के खातिर
उन्हें आइना दिखाया
उन्हें रास नहीं आया
हमें दुश्मन करार दे दिया
क्यों नहीं समझते ?
हमने तो
बेहतर करने के लिए
सिर्फ उनका होंसला
बढाया था
926-44-12-12-2012
शायरी,गरूर,

Saturday, December 8, 2012

मुझे हक नहीं



मुझे हक नहीं
तुम पर नाराज़ होने का
ना हक तुम्हारी बेरुखी पर
सवाल पूछने का
उम्मीदों पर जब नहीं
उतर सका खरा
नहीं दे सका जो चाहा
तुमने मुझसे
निभा ना सका उन वादों को
जो किये तुमसे
मुझे हक नहीं तन्हाई में भी
आसूं बहाने का
जब तुम्हारी हसरतों के
लायक ही ना था
मुझे हक नहीं तुम पर
इलज़ाम लगाने का
गुनाहगार भी मैं हूँ
सज़ा का हक़दार भी मैं  हूँ
जिसने दिल लगाया था
इक पत्थर दिल से
923-41-08-12-2012
दिल,हक, हसरत,हसरतें,मोहब्बत, शायरी,

Wednesday, December 5, 2012

उम्मीद को क्यूं नाराज़ करूँ


ज़िन्दगी भर
वादों पर यकीन किया
अब क्यों वादों को
बदनाम करूँ
जानता हूँ
पहले भी कभी
पूरे नहीं हुए
अब भी पूरे नहीं होंगे
पर उम्मीद को
क्यूं नाराज़ करूँ
900-18-05-12-2012
शायरी ,वादे,उम्मीद

हँसते हँसते मारा था तीर मोहब्बत का



हँसते हँसते मारा था
तीर मोहब्बत का
सीधा निशाने पर लगा
हमारा तो दिल छिद गया
उनका शौक़ पूरा हुआ
जो खाता था
कसम साथ निभाने की
वही कातिल साबित हुआ
हमें भी क्या पता था
हँसते चेहरे के पीछे
शैतान छुपा हुआ था
899-17-05-12-2012
मोहब्बत ,प्यार,शौक़,दिल, शायरी

Sunday, December 2, 2012

नया दोस्त बना कर क्या करूँ



खुद के वजूद का
पता नहीं
नया दोस्त बना कर
क्या करूँ
ये मुझे गवारा नहीं
दोस्त बनाते ही
दुनिया से उठ जाऊं
दोस्त का दिल तोड़ दूं
उसे आसूं बहाने पर
मजबूर कर दूं
वो मुझे दगाबाज़
समझेगा
नए दोस्त बनाने से
डरेगा
नहीं चाहता दोस्ती के
नाम से ही उसका
आइतबार उठा दूँ
खुद के वजूद का
पता नहीं
नया दोस्त बना कर
क्या करूँ
887-06-02-12-2012
ज़िन्दगी,दोस्त,शायरी, दोस्ती

Wednesday, November 28, 2012

मंजिल न पा सका



घर तो मिल गया
मगर घर का
दरवाज़ा नहीं मिला
उम्मीद में घर के
बाहर ही
वक़्त काटता रहा
आवाज़ तो सुन ली
मगर घूंघट से ढका
चेहरा नहीं दिखा
मंजिल के
पास हो कर भी
मंजिल न पा सका
866-50-28-11-2012
शायरी,उम्मीद, मंजिल