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Monday, December 3, 2012

ज़िन्दगी के सफ़र में गिरते सभी हैं


ज़िन्दगी के सफ़र में
गिरते सभी हैं
ज़ख्म खाते भी सभी हैं
दर्द से करहाते भी सभी हैं
मुस्कराककर उठते वहीं हैं
जो मंजिल
तक पहुंचना चाहते
ज़ज्बा नहीं खोते
जो रोते रह जाते
वो रास्ते से भटक जाते
मंजिल का पता ही
भूल जाते हैं
889-08-03-12-2012
ज़िन्दगी,सफ़र,मंजिल ,ज़ज्बा

Wednesday, November 28, 2012

मंजिल न पा सका



घर तो मिल गया
मगर घर का
दरवाज़ा नहीं मिला
उम्मीद में घर के
बाहर ही
वक़्त काटता रहा
आवाज़ तो सुन ली
मगर घूंघट से ढका
चेहरा नहीं दिखा
मंजिल के
पास हो कर भी
मंजिल न पा सका
866-50-28-11-2012
शायरी,उम्मीद, मंजिल

Sunday, October 28, 2012

मिला नहीं जब तक साहिल उन्हें



लबों पर नाम उनका ,
जहन में यादें उनकी
दिल धड़कता उनके लिए
पर उन्हें फ़िक्र नहीं
हमने समझा था
साहिल उन्हें
उन्होंने समझा साहिल तक
पहुचाने की किश्ती का
मांझी हमें
मिला नहीं जब तक
साहिल उन्हें
हँस कर मिलते रहे
हमारे दिल से खेलते रहे
806-48-28-10-2012
यादें,साहिल,मंजिल,बेवफाई ,शायरी,

Wednesday, October 24, 2012

मंजिल करीब थी फिर भी बहुत दूर थी



मंजिल करीब थी
फिर भी बहुत दूर थी
कदम थके नहीं थे
ना हे हिम्मत हारी थी
वो दिख क्या गयी
कदम अड़ गए 
नज़रें हटने का नाम
नहीं ले रही थी
खबर भी नहीं हुयी
कब सुबह से शाम
हो गयी
मंजिल करीब थी
फिर भी बहुत दूर थी
790-32-24-10-2012
मंजिल

मंजिल की तलाश में



मंजिल की तलाश में
ज़िन्दगी भर
उनके पैगाम का इंतज़ार
करता रहा
जब तक पैगाम आया
मंजिल का
पता बदल चुका था
तन्हाई को
मंजिल मान चुका था 
समझ चुका था 
इक दिन तो
किसी एक को तनहा
रहना होगा
अकेले में रोना होगा
789-31-24-10-2012
मंजिल,तलाश,ज़िन्दगी ,मोहब्बत,तन्हाई,

Monday, August 13, 2012

मंजिल



सोलह की उम्र थी
हवा में दुपट्टा
बेहिसाब उड़ रहा था
जुल्फें बेख़ौफ़ लहरा रही थी
आँखों में अजीब सी
कशिश थी
गीत गुनगुनाते हुए
मदमाती चाल से
बेफिक्र चली जा रही थी
नज़र पडी तो दिल में
बिजली सी कोंधी
एक झपट्टे में दिल
ले गयी
यूँ लगा हुस्न परी
आसमां से ज़मीं पर
उतर आयी
पता नहीं था
अब तक जिस दिल को
कहाँ मंजिल
कहाँ ठिकाना उसका
आज तलाश पूरी हुयी
पता चल गया
कहाँ मंजिल उसकी
13-08-2012
659-19-08-12

Tuesday, June 5, 2012

राह मुश्किल हो गयी तो क्या चलना बंद कर दूं



राह
मुश्किल हो गयी
तो क्या चलना बंद
कर दूं
गिर गया तो क्या
उठूँ नहीं
जो चलेगा
वही तो गिरेगा
उठेगा नहीं तो
मंजिल पर
कैसे पहुंचेगा
मैं उनमें से नहीं
जो हार मन कर
बैठ जाते
मानता  हूँ दर्द भी
होता है
आँखों में आंसू भी
आते हैं
लड़ता रहा हूँ
ज़माने से
वक़्त के थपेड़ों से
हर बार अंत में
मैं ही हँसा हूँ
इस बार भी मैं ही
हँसूँगा
सदा की तरह
चलता रहूँगा
हिम्मत होंसले से
आगे बढ़ता रहूँगा
05-06-2012
568-18-06-12

Saturday, March 17, 2012

कभी कहते थे तुम ….

कभी कहते थे तुम
हम मंजिल तुम्हारी
तुम मंजिल हमारी
दो धाराएं दिलों  की
मिल कर बनेगी एक
नदी मोहब्बत की
साथ धड्केंगे साथ
जियेंगे
एक दूजे के खातिर 
क्यों फिर
रास्ता मोड़ा तुमने
बदल दी मंजिल अपनी
तोड़ दिए वादे 
कर दिया बदनाम
मोहब्बत को
इतना भी ख्याल नहीं
आया तुम्हें
जब पता चलेगा
ज़माने को
लोग मोहब्बत के
नाम से नफरत करेंगे
वादों से यकीन
अपना उठा देंगे
17-03-2012
390-124-03-12

Thursday, February 23, 2012

क्षणिकाएं -14


मध्यस्थ
परमात्मा
और इंसान के
बीच पंडित मौलवी
क्या उसे वाकई ज़रुरत
किसी मध्यस्थ की
मज़ाक
लोग
मज़ाक करना
पसंद करते
सह नहीं सकते
मंजिल तक पहुंचना
मंजिल तक पहुंचना
आवश्यक
किस रास्ते से पहुचना
जानना भी आवश्यक
मनुष्य
मन
मनन
मानस
की लड़ी
निरंतर चलती रहती
मेहमान
आये तो भी सुहाए
जाए तो भी सुहाए
पूजा
दुष्कर्म करो
फिर पूजा करो
सज़ा से बचो
आज कल
आज कल
ना सुन सकते है
ना कह सकते है
बस चुप रह
सकते है
23-02-2012
229-140-02-12

Friday, November 25, 2011

अब तसल्ली मुकाम मेरा


अब ना पाने की
ख्वाइश 
ना रोने की ज़रुरत
मुझको
ना ग़मों की दहशत
ना मंजिल की तलाश
मुझको
अब तसल्ली मुकाम
मेरा
खुश हूँ उसमें
जो मिला,ना मिला
निरंतर मुझको
25-11-2011
1818-83-11-11