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Saturday, December 15, 2012

दर्द के खामोश समंदर



दर्द के खामोश
समंदर को
बहुत शिद्दत से
सम्हाल कर
सीने में दबा रखा है
डरता हूँ
कहीं ज़ज्बात उफन कर
बाहर ना आ जाएँ
दर्द देने वालों चेहरों को
बेनकाब ना कर दे
दुनिया को
उनकी हकीकत से
रूबरू ना करा दे
मुंह दिखाने के
लायक ही ना छोड़े
948-67-15-12-2012
शायरी,मोहब्बत,ज़ज्बात ,दर्द ,

Tuesday, December 11, 2012

जब तुम्हारी याद सताती है



जब तुम्हारी
याद सताती है
ज़ज्बातों की नदी
उफन कर
बहने लगती है
मन के पहाड़ों की बर्फ
पिघलने लगती है
हसरतों के रेगिस्तान में
आंधी चलने लगती है
आँखें नम होने लगती हैं
ज़िन्दगी
बोझ लगने लगती है
931-50-12-12-2012
शायरी,याद,यादें,हसरत,ज़ज्बात

Friday, October 5, 2012

ऐसा नहीं कि हमें उनसे मोहब्बत ना रही


ऐसा नहीं कि हमें उनसे मोहब्बत ना रही
ये बात जुदा है कि अब वो हमारी ना रहीं

ज़ज्बातों से खेलने की आदत पुरानी थी
अब उनकी हकीकत हमें पता चल गयी

गम नहीं की उनसे अब राजदारी ना रही
शायद  उनको भी हमारी ज़रुरत ना रही

जब  भी बदल जायेगी ,फितरत  उनकी
नहीं कह सकेगा कोई वो हमारी ना रही

बसा लेंगे फिर उन्हें अपनी ज़िन्दगी में
कह देंगे दुनिया को दिल से दूर नहीं
रही
760-05-05-10-2012
ज़ज्बात,मोहब्बत,गम,फितरत

Sunday, September 23, 2012

उनकी बेरुखी के बाद


उनकी बेरुखी के बाद
हमें समझ आया
हम दिन में जुगनू
पकड़ने की कोशिश
कर रहे थे
जिसे जुगनू समझ रहे थे
वो जुगनू नहीं
शहद की मक्खी थी
उन्हें मोहब्बत तो
ज़ज्बातों से खेलने की थी
कोई पास आने की
कोशिश करता तो
काट लेती थी
746-42-23-09-2012

Tuesday, August 21, 2012

इतना खौफज़दा हूँ



तुम से मिलने से पहले ही
दिल पर पत्थर रख कर
यादों के ताजमहल
बना लिए मैंने
मुझे पता नहीं मिल कर
क्या सोचोगी
क्या कहोगी मुझसे
जब तुमसे पूछूंगा
अभी से बता दो
तुम्हारा इरादा क्या है
क्या तुम भी वैसे ही
ज़ज्बातों से खेलोगी ?
जैसे हर मुस्कारा कर
मिलने
वाले ने खेला अब तक
क्या करूँ?
इतना खौफज़दा हूँ
इतनी बार धोखा खाया है
यादों के सहारे जी लूंगा
पर फिर धोखा नहीं
 खाऊंगा
21-08-2012
665-25-08-12

Sunday, August 5, 2012

क्या ज़माने का दस्तूर निभाते हो तुम ?



किस बात से
घबराते हो तुम
क्यूं इतना
खौफ खाते हो तुम
मुस्कारा कर मिले थे
दिल से दिल मिलाया
मन से मन मिलाया
अब पहचानते तक
नहीं हो
वो तो चाहत का
सौदा था
ये हक तो नहीं दिया था
मेरे ज़ज्बातों से खेलो
क्या ज़माने का दस्तूर
निभाते हो तुम ?
05-08-2012
654-14-08-12

Friday, August 3, 2012

कितनी ज़ज्बाती थी बोतल



यूँ ही सागर किनारे
टहलते टहलते ,
मिली इक बोतल अनायास
छुपा रखा था
अपने दामन में उसने
इज़हार-ऐ-मोहब्बत के
लब्जों से
भरा एक ख़त
ज़हन में ख्याल आया
कितनी
ज़ज्बाती  थी बोतल
खुद मय की बेवफाई
भुगत रही थी
जो किसी और के हलक में
उतर चुकी थी
गम में डूबी थी
बोतल खुद
समंदर के पानी में
डूबकियां लगाती रही
मगर  दूसरों के प्यार को
सीने से लगाती रही
कितनी
ज़ज्बाती थी बोतल
खुद लुट गयी
दूजे को लुटते नहीं देखना
चाहती थी
03-08-2012
643-03-08-12