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Tuesday, December 11, 2012

हम तारीफ़ करते रहे,वो सर पर चढाते रहे



हम तारीफ़ करते रहे
वो सर पर चढाते रहे
खुद को तारीफ़ का
हक़दार समझने लगे
जुबान में तल्खी
अंदाज में गरूर आ गया
जब समझाने के खातिर
उन्हें आइना दिखाया
उन्हें रास नहीं आया
हमें दुश्मन करार दे दिया
क्यों नहीं समझते ?
हमने तो
बेहतर करने के लिए
सिर्फ उनका होंसला
बढाया था
926-44-12-12-2012
शायरी,गरूर,

Wednesday, December 5, 2012

हमने सर पर चढ़ाया तुमको



हमने सर पर चढ़ाया
तुमको
गिरते से उठाया तुमको
तुम समझने लगे
तुम काबिल
हम नाकाबिल हो गए
खुद को हम से भी ऊपर
समझने लगे
गरूर इतना छा गया
ज़हन में
खुद को खुदा समझने लगे
भूल गए
जब भी उतरोगे ज़मीन
पर कभी
सहारे के लिए कंधा तो दूर
कोई झांकेगा भी नही
897-15-05-12-2012
काबिल,नाकाबिल,घमंड,गरूर

Wednesday, September 19, 2012

छोटी सी कामयाबी पर



हमारी
छोटी सी कामयाबी पर
इतनी पीठ थपथपाई गयी
पीठ दर्द करने लगी
कामयाबी सर पर
चढ़ गयी
अपने आप को बड़े भारी
हूनर मंद समझने लगे
थोड़ी सी कामयाबी में
मदहोश हो गए
भूल गए
आगे बढ़ने के लिए
लक्ष्य को
याद रखना होता
मेह्नत से मुंह ना
मोड़ना होता
नतीजा वही हुआ
जो होना था
होश में आये तो देखा
हम चौराहे पर खड़े थे
लोग आगे बढ़ गए
हम वहीं खड़े रह गए
735-31-19-09-12

Saturday, September 1, 2012

जब भी चढ़ जाती है,कामयाबी सर पर




जब भी चढ़ जाती है
कामयाबी सर पर
अपने भी पराये लगते हैं
जो भी करे तारीफ़
वही अच्छे लगते हैं
कामयाबी के गरूर में
भूल जाता इंसान
सच्ची बात कहने वाले ही
अपने होते हैं
जब तक रहती है
कामयाबी
मीठी बातों से लुभाने वाले
तब तक ही साथ
रहते हैं
01-09-2012
705-01-09-12


Monday, May 28, 2012

जब तक थे साथ हमारे



जब तक 
थे साथ हमारे
कदम नहीं 
बहकते थे उनके
हुए जब से जुदा हमसे
होश नहीं उनको
मदहोश भी इतने
सम्हाले नहीं सम्हलते
गरूर भी इतना
मुंह से नहीं कहेंगे
फिर साथ चाहिए
हमारा
उनकी शर्तों पे
हम आगे बढ़ कर
हाथ भी थाम ले
तो छुडायेंगे भी नहीं
पर कहेंगे ज़रूर
तुम्हें ही ज़रुरत
हमारी
हम तो पहले ही
खुश थे
28-05-2012
532-52-05-12

Sunday, December 18, 2011

कल तक खूब चहकते थे


कल तक
खूब चहकते थे
खूब बहकते थे
दिलों में
आग लगाते थे
हुस्न के
गरूर में बेहोश थे 
महफ़िल-ऐ-जान
होते थे
उम्र ने नहीं बख्शा
अपना जलवा दिखा
दिया
उन्हें हकीकत से
रूबरू करा दिया
चेहरे का नूर कम
हो गया
आज एक सूरत भी
मयस्सर नहीं
उन्हें देखने के लिए
एक कंधा भी नहीं
रोने के लिए
झूंठी दिलासा ही 
देने के लिए
18-12-2011
1869-37-12

Thursday, November 24, 2011

क्यूं मुझ से खार खाते ?


आज तक
समझ नहीं पाया
वो क्यूं मुझ से खार
खाते ?
ना मुस्कराते
ना नज़रें मिलाते
ना जाने किस बात की
सज़ा मुझको देते
मैंने तो सिर्फ इतना
कहा था
इतना गरूर ना 
रखा करें
जिससे भी मिलें
निरंतर
मुस्करा कर मिला करें
अपने को सबसे बेहतर
ना समझा करें 
24-11-2011
1815-86-11-11

Saturday, July 16, 2011

अब मिलने की रस्म निभाते हैं

गले मिल कर
रोने वाले
अब मिलने की रस्म
निभाते हैं
रकीबों से हँस हँस कर
 मिलते हैं
जले पर नमक
छिड़कते हैं
करीब आकर भी
चुपचाप निकल जाते
दर्द-ऐ-दिल बढाते हैं
निरंतर गरूर में
बहकते हैं
मोहब्बत को खेल
समझते हैं
(रकीब=दुश्मन ,Enemy)
16-07-2011
1193-73-07-11

Friday, May 20, 2011

असंतुष्ट

बगीचे में
कई फूल खिले थे
खूबसूरत
रंग और महक से 
भरे थे
आँखों को निरंतर 
लुभाते
बगीचे में जब भी 
बैठता
सुकून नहीं मिलता
कुछ ना कुछ खालीपन
लगता
खूबसूरत माहौल में भी
मन असंतुष्ट रहता
विचारों का मंथन किया
कारण पता ना चला
तभी ख्याल आया
खुद से सवाल किया
कहीं गरूर तो बीच में
नहीं आता ?
संतुष्टी से दूर रखता
अपनों से दूर करता
आखिर प्रश्न का उत्तर
मिल गया
ज्यादा पाने की
इच्छा और गरूर ने
असंतुष्ट बना दिया
20-05-2011
894-101-05-11