Showing posts with label हुस्न. Show all posts
Showing posts with label हुस्न. Show all posts

Monday, March 5, 2012

कोई क़द्रदान नहीं है

उन्हें देख कर
मुस्काराता गर कोई
आँखों से
आँखें मिलाता कोई
त्योरियाँ चढाते हैं 
तल्ख़ आँखों से देखते हैं
शहर में
बदनाम करते हैं
फिर ज़माने भर में
शिकायत करते हैं
शहर में हुस्न का कोई
क़द्रदान नहीं है
05-03-2012
297-31-03-12

Monday, January 30, 2012

मदहोश

वो अपने हुस्न में
इतना मदहोश हैं
उन्हें ख्याल ही नहीं 
हम रोज़ ख़्वाबों में
उनसे मिलते हैं
उनसे गुफ्तगू करते हैं
हर जिस चीज़ के लिए
वो होश में ना करते हैं
ख़्वाबों में
खुद पहल करते हैं
हमारी हसरतों को
बड़े अंदाज़ से
अंजाम तक पहुंचाते हैं
30-01-2012
87-87-01-12

Sunday, December 18, 2011

कल तक खूब चहकते थे


कल तक
खूब चहकते थे
खूब बहकते थे
दिलों में
आग लगाते थे
हुस्न के
गरूर में बेहोश थे 
महफ़िल-ऐ-जान
होते थे
उम्र ने नहीं बख्शा
अपना जलवा दिखा
दिया
उन्हें हकीकत से
रूबरू करा दिया
चेहरे का नूर कम
हो गया
आज एक सूरत भी
मयस्सर नहीं
उन्हें देखने के लिए
एक कंधा भी नहीं
रोने के लिए
झूंठी दिलासा ही 
देने के लिए
18-12-2011
1869-37-12

Wednesday, June 22, 2011

सुकून की तलाश में सब कुछ करूंगा

तेरे हुस्न को देख कर
टूटे थे
उन्हें ढूँढने में लगा हूँ
किसी एक में भी
तेरा अक्स दिख जाए
तो दिल की आग
बुझा लूं
टुकड़ों को जोड़ने की
कोशिश करूंगा
तुम ना मिली
तुम्हारे अक्स से ही
हसरत पूरी करूंगा
दिल को समझाऊंगा
निरंतर
अश्क बहा रही
आँखों को दिलासा
दूंगा
सुकून की तलाश में
सब कुछ करूंगा
22-06-2011
1086-113-06-11

Friday, June 10, 2011

उन्हें भी सरूर था,मुझे भी सरूर था

ना उनका कसूर था
ना मेरा कसूर था
उनका हुस्न और मेरा
दिल कसूरवार था
ना मेरे बस में था
ना उनके बस में था
कसूर दोनों की आँखों
का भी कम ना था
नज़र से नज़र का
मिलना ही काफी था
निरंतर ख्यालों में आना
ख़्वाबों में देखना
भी मजबूरी था
मोहब्बत का नशा
ही कुछ ऐसा था
उन्हें भी सरूर था
मुझे भी सरूर था
10-06-2011
1029-56-06-11