उन्हें देख कर
मुस्काराता गर कोई
आँखों से
आँखें मिलाता कोई
त्योरियाँ चढाते हैं
तल्ख़ आँखों से देखते हैं
शहर में
बदनाम करते हैं
फिर ज़माने भर में
शिकायत करते हैं
शहर में हुस्न का कोई
क़द्रदान नहीं है
05-03-2012
297-31-03-12
निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )