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Thursday, July 28, 2011

तुम बेखबर अपनी मासूमियत से

खूबसूरत

चेहरा तुम्हारा

अनछुए गुलाब के

फूल सा महकता

निरंतर दिल को

लुभाता

नज़रों का धोखा नहीं

हकीकत है

कुछ तुम में है

जो किसी और में नहीं

तुम बेखबर

अपनी मासूमियत से

मैं वाकिफ हो गया

कद्रदान बन गया

दिल भी बेबस

मजबूरी में तुम पर

लुट गया

28-07-2011

1256-140 -07-11

Monday, July 18, 2011

कब हकीकत को जानूंगा ?

कई रातें तेरी यादों में काटी
बार बार दिल को समझाया
कल सुबह नया सूरज उगेगा
मुखड़ा तेरा नज़र  आयेगा
हर सुबह पहले से बदतर
होती रही
तुमसे दूरी निरंतर बढ़ती रही
अब खुद से सवाल करता हूँ
कब हकीकत को जानूंगा ?
कब तक 
 बेबसी में ज़िन्दगी काटूंगा 
 दिल को भरमाऊंगा ?
खुद ही जवाब देता हूँ 
जब तक बहलेगा,बहलाऊंगा
नहीं बहलेगा तो जान दे दूंगा
18-07-2011
1200-80-07-11