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Sunday, July 17, 2011

नए जोश से उठता हूँ, फिर से चल पड़ता हूँ

स्वप्न लोक में खोता हूँ
इच्छाओं को संजोता हूँ
मन ही मन खुश होता हूँ
आशाओं में जुटता हूँ
कुछ दिनों में थकता हूँ
निराशा से भर जाता हूँ
रुआसाँ कौने में बैठता हूँ
किस्मत को कोसता हूँ
चेहरे की चमक खोता हूँ
निरंतर स्वयं से पूछता हूँ
क्या इतना कमजोर हूँ
हार मान लूं ?
कायरता से मैदान छोड़ दूं
शर्म से विचलित होता हूँ
नए जोश से उठता हूँ
फिर से चल पड़ता हूँ
17-07-2011
1197-77-07-11

Wednesday, April 20, 2011

जोश


रेगिस्तान
का मुसाफिर हूँ
धूल आंधी में जीता हूँ
बियाबान दुनिया है
दूर तक हरयाली नहीं
दूर से रेत के धोरे आस
जगाते
पास पहुंचता तब तक
हवा में उड़ जाते
मरिचिकाओं में पानी
ढूंढता हूँ
हर बार प्यासा रहता  हूँ
फिर भी निरंतर चलता
रहता
कहीं कैक्टस नज़र आता
हरीतिमा का अहसास
 होता
मन में आशा जगाता
सफ़र पूरा करना है
मन में ठान
दुगने जोश से चल
पड़ता हूँ 
20-04-2011
713-136-04-11