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Friday, December 7, 2012

जो देख रहे हैं



जो देख रहे हैं
वह सत्य है या असत्य
यह तो पता नहीं
देखने दिखाने वालों के
मंतव्य का भी पता नहीं
किस का कैसा सोच
अच्छा या बुरा
यह भी पता नहीं  
किसका ईमान से 
किस का
स्वार्थ से भरा हुआ
यह भी पता नहीं
क्यों मन को
व्यथित करते हो
दूसरे जैसे भी देखते
दिखाते हैं
उन्हें वैसे ही देखने
दिखाने दो 
पर खुद तो
इमानदारी से देख लो
जो जैसा भी दिखता है
उसे वैसा मत समझ लो
विवेक और बुद्धि से
काम लो
भेड की खाल में छुपे
भेडियों को पहचान लो
905-23-07-12-2012
देखना,सत्य,असत्य,मंतव्य,विवेक,बुद्धि

Friday, November 23, 2012

मैंने तो चाहा था सवेरा बन कर ही जीऊँ



मैंने तो चाहा था
सवेरा बन कर ही जीऊँ
शाम कभी देखू ही नहीं
मेरा सपना तो पूरा
नहीं हुआ
पर इतना अवश्य
समझ गया
बिना शाम देखे
सवेरे का महत्व
नहीं समझ पाता
जीवन का हर पहलु
नहीं जान पाता
जीवन के हर रूप को
दिखाने के पीछे
इश्वर का मंतव्य
नहीं समझ पाता
862-46-23-11-2012
जीवन,ज़िन्दगी,सवेरा,शाम,इश्वर,मंतव्य

Sunday, April 3, 2011

संयोग

इंसान से इंसान
संयोग से मिलता
इंसान का जन्म
संयोग से होता
चाहने ना,चाहने से
कुछ ना होता 
निरंतर मंतव्य कुछ 
नतीजा कुछ और होता
किसके घर पैदा होगा
राजा होगा या रंक होगा
संयोग जीवन का
अभिन्न अंग
जब तक जीवन
रहेगा
संयोग से नाता
ना टूटेगा
03-04--11
587—20 -04-11