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Sunday, December 2, 2012

सन्नाटों का शोर



शोर ही शोर
हर तरफ शोर ही शोर
दिखावे का शोर
स्वार्थ का शोर
पर मन में सन्नाटा
ज़िन्दगी इस हद तक
उलझ गयी शोर में
रह गया केवल
सन्नाटों का शोर
बस गया दिलों में
बस गया रिश्तों में
प्यार
भटक गया अहम् में
रह गया बस
चेहरे पर चेहरा चढ़ाना
झूठी मुस्कान
चिपकाए घूमना 
ज़िन्दगी जीना नहीं
ज़िन्दगी काटना
बन गया सबब
जीने का
886-05-02-12-2012
जीवन,ज़िन्दगी,शोर

Saturday, April 2, 2011

शोर मनों में,शोर दिलों में

रात के सन्नाटे में
सुलाने के लिए
माँ लोरी सुनाती
दिन के कोलाहल में
लाडलों को नींद कैसे आती ?
किसे चिंता उनके जीवन की
सब सोचते अपनी अपनी 
शोर से बचपन शुरू होता
शोर में जीवन कटता
जहन में शोर भरा रहता
शांती का बसेरा नसीब
ना होता  
शोर मनों में,शोर दिलों में
 कहाँ अब कोई किसी को
समझता
प्यार शोर में दबा रहता
स्नेह शोर में छुप जाता
चैन इंसान निरंतर खोता
धन,आडम्बर के शोर में
सुकून खोता
02-04--11
586—19 -04-11