1426-01-09-11
निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )
Thursday, September 1, 2011
अतीत का दस्तावेज
1426-01-09-11
Wednesday, August 17, 2011
क्या दिया ज़िन्दगी ने मुझको खुद से पूछता हूँ
क्या दिया
ज़िन्दगी ने
मुझको
खुद से पूछता हूँ
अतीत को
टटोलता हूँ
कभी हंसता हूँ
कभी रोता हूँ
निरंतर सोच में
पड़ता हूँ
जो करना नहीं
चाहिए था
उसका कैसे
सुधार करूँ ?
भविष्य को
चैन से भर दूं
या बचा समय
ऐसे ही काट लूं ?
क्या खुद को
माफ़ कर पाऊंगा ?
क्या चैन से
मर पाऊंगा ?
उत्तर मिलता नहीं
क्या इसे कर्मों की
सज़ा समझूँ ?
आगे दिल
किसी का
ना दुखाऊँ
वो रास्ता
समझूँ ?
17-08-2011
1370-92-08-11
Monday, July 25, 2011
आज जो हो रहा उसे कौन देखना चाहता
वो पतली सी गली उसके
आख़िरी छोर पर
मेरा पुश्तैनी मकान
चूने की दीवारें
छोटे छोटे कमरे
कौने में बिना मुंडेर की
पतली से सीढ़ी
सम्हल कर ऊपर चढो तो
समय से आहत,उबड़ खाबड़ छत
माता पिता की नज़रों से बच कर
उस पर चढ़ कर
भरी दोपहर में पतंग बाज़ी
किसका मांझा तेज़ है
वर्चस्व की लड़ायी
वोह काटा की आवाजें
जीत की किलकारियां
हार से मुरझाये चेहरों
की सिसकियाँ
आज जो जीता कल हारता
पतंग उड़ाना बंद ना होता
निरंतर याद आती
मुझे मेरी गली की पतंगबाजी
ना अब मैं वहां रहता
ना वो गली और मकान
सब विकास की भेंट चढ़ गया
अब एक बड़ा भारी मॉल वहां खडा है
जिसने मेरे अतीत को दबा दिया
साथ ही दबा दिया किलकारियों को
जोश खरोश को
भरी दोपहर में खेल को
छोड़ दिया बंद कमरों में टीवी को
उसके देख कर
सपने पूरे कर लो
अब भी नींद में वोह काटा की
आवाज़ मुंह से निकलती
बच्चे हंसी उड़ाते,फिर पूंछते
पापा पुराने दिन क्यों नहीं भूलते ?
उन्हें कैसे समझाऊँ
उन्ही दिनों ने अब तक ज़िंदा रखा
आज जो हो रहा
उसे कौन देखना चाहता
25-07-2011
1232-112-07-11