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Tuesday, August 21, 2012

इमानदारी बकवास है



इमानदारी बकवास है
पैसा,सत्ता, ताकत ही
सब कुछ है
लूट खसोट करना
भ्रष्ट होना सबसे उत्तम  है
ना यह सत्य है
ना भावनाओं का
उबाल
ना मस्तिष्क की उपज
ना ही ह्रदय की आवाज़
ये केवल
मेरी आँखों ने जो देखा
मेरे कानों ने जो सुना
मेरे शहर में
फुटपाथ पर लेटे
भूख से मर रहे
एक गरीब असहाय ने
आंसू बहाते हुए
जो कहा उसका
वर्णन है
21-08-2012
662-22-08-12

Sunday, August 7, 2011

कभी कभी उकता जाता हूँ

कभी कभी उकता

जाता हूँ

विचित्र मनोस्थिति में

खुद को पाता हूँ

जो कर रहा उसे छोड़ कर

कुछ नया करना

चाहता हूँ

विचारों के इस द्वंद्व में

खुद को असहाय पाता हूँ

सोच में डूब जाता हूँ

क्या सब के साथ

ऐसा होता है ?

निरंतर प्रश्न का उत्तर

ढूंढता हूँ

उत्तर कभी मिलता नहीं

कुछ करते रहने की

इच्छा में ,जहां रुका था

वहां से फिर चल

पड़ता हूँ

07-08-2011

1310-32-08-11

Thursday, July 14, 2011

जीवन का मर्म

सुबह का सूरज
सब को भाता
ताज़ा धूप सब को
सुहाती
चंचल बचपन सी
लगती
दोपहर का सूरज
आग उगलता
देखना संभव ना होता
धूप की गर्मी बेहाल
 करती
शाम का सूरज
थका मांदा
असहाय दिखता 
नम्र धूप चुपचाप
रहती
सूरज की जीवन
सुबह प्रारम्भ होता
शाम ढले समाप्त होता
इंसान को निरंतर
जीवन का मर्म
समझाता
14-07-2011
1179-62-07-11

Monday, July 11, 2011

वो असहाय खडा देखता रहा

बूढा हो गया था
आँखों से
कम दिखता था
घुटनों में दर्द था
चलना भी मुश्किल था
कोई सड़क पार 
करवा दे
इंतज़ार में खडा था
लोग निरंतर आते 
देख कर पास से
निकल जाते
वो असहाय खडा
देखता रहा
आज ख्याल आ 
रहा था
जवानी में वो भी
परवाह नहीं करता था
बूढ़े,अंधों का ख्याल
नहीं रखता था
वक़्त आज
कर्मों का फल दे 
रहा है
किस को दोष दे
उसे समझ नहीं आ
रहा था
11-07-2011
1168-52-07-11