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Saturday, December 15, 2012

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ



मैं तुमसे कुछ कहना
चाहता हूँ
पर कहते हुए डरता हूँ
कहते कहते रुक जाता हूँ
मन की इच्छाओं को
अपने भीतर समेट लेता हूँ
कैसे कहूँ के चक्रव्यूह में
उलझ जाता हूँ
या तो मुझे तुम पर
या मुझे खुद पर विश्वास नहीं
मैं तुम्हें,तुम मुझे ठीक से
समझ नहीं पाए
तुम भी प्रयत्न करो
मैं भी प्रयत्न करूंगा
पहले रिश्तों को सुद्रढ़ बनाएं
शक को रिश्तों से दूर हटायें
फिर तुम मुझे मैं तुम्हें
मन की बात कह पाऊंगा
ना डरूंगा ना घबराऊंगा
955-74-15-12-2012
जीवन,विश्वास,अविश्वास ,उलझन,रिश्ते

Sunday, February 12, 2012

उलझन

उलझन से बचने
के लिए हमने उनकी
इज़हार-ऐ-मोहब्बत
का जवाब ना दिया
उन्होंने तौहीन समझ
दिल से लगा लिया
अपनी चाहत को
नफरत में बदल दिया
सारे शहर में बदनाम
कर दिया
उनकी फितरत ने
हमें उलझन में
ड़ाल दिया
12-02-2012
158-69-02-12

Friday, May 20, 2011

उलझन

पता ना था
ज़िन्दगी उलझन का
दूसरा नाम है
जितना सुलझाओ
उतने उलझते जाओ
निरंतर
पहेली खेलते जाओ
पसीना भी आता
आनंद भी आता
पहेली सुलझाना
ख़त्म ना होता
जीवन निरंतर
चलता रहता
20-05-2011
896-103-05-11 

Sunday, April 10, 2011

उलझन


उलझन
में उलझा था
उलझन

पर कुछ लिखूं
इसी उलझन में
उलझता  गया
समय बीतता गया
दिमाग और उलझता 
गया
कैसे इस उलझन को 
सुलझाऊं ?
सोचने लगा,जितना  
सोचता 
उतना और  उलझता
तभी ख्याल आया
पढने वाले भी 
पढ़ते ,पढ़ते
उलझ गए होंगे
उनको उलझन से
मुक्त करने के लिए
उलझन पर उलझना
बंद किया

उलझन पर लिखना
निरंतर
उलझन बन गया
जब भी उलझन
शब्द आता
मैं फिर उलझता
10-04-2011
638-71-04-11