Showing posts with label प्रलोभन. Show all posts
Showing posts with label प्रलोभन. Show all posts

Friday, October 14, 2011

शैतान मुझे निरंतर लुभाता



शैतान मुझे निरंतर
लुभाता
जीने के नए तरीके
बताता
मेरे मान्यताओं को
खोखला बताता
वक़्त के साथ चलने की
सलाह देता
नित नए प्रलोभन देता
मैं ठहरा ढीठों में ढीठ
आदत अपनी नहीं
बदलता
संस्कारों के जाल से
नहीं निकलता
मन की खुशी के लिए
सच ,ईमान की
ज़िन्दगी जीता जाता
14-10-2011
1646-54-10-11

Thursday, April 7, 2011

पश्चाताप

कई
पौधे बगिया में थे,
कुछ में कलियाँ थी
,
खिलने की बाट
जोह
रहीं थी
कई फूल खिले थे

कुछ अध्
खिले,
कुछ शवाब पर थे
,
कुछ जीवन के

अंतिम पड़ाव पर थे
,
भौरें ने
बगिया में प्रवेश किया
घूम कर
बगिया का जायजा लिया
बूढ़े फूलों को दूर से देखा

शवाब पर आये
फूलों की और रुख किया
गुंजन से उन्हें लुभाने लगा

एक फूल
गुंजन पर मोहित हुआ
भौरें को निमंत्रण दिया

फूल गर्व से भर गया

भौरें ने
केवल उस को चुना
खुद को दूसरों से
बेहतर समझने लगा
कुटिल भौरें ने
रसस्वादन फूल का किया
वासना
को संतुष्ट किया
फूल को रोते छोड़ गया

फूल अब पछता रहा था

गलती का
अहसास उसे हो गया
भौरों के
मीठे गुंजन के प्रलोभन में
 फसने पर
गर्व करने वाला
निरंतर
पश्चाताप में डूबा था