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Saturday, December 15, 2012

सर उठा कर जिया हूँ अब सर झुका कर कैसे जियूं ?



बहुत प्रयत्न किया
पर समझ नहीं पाया
कैसे लोगों को खुश करूँ ?
क्या उनकी हर बात में
हाँ में हाँ मिला लूँ
झूठ को सच कहूँ ?
या ज़माने के साथ चलूँ
मुखोटा पहन लूँ
उनकी खुशामद करूँ
झूठी प्रशंसा करूँ
पर यह तो
हो नहीं सकता
खुद के लिए
कभी झूठ नहीं बोला
उनके लिए कैसे बोलूँ ?
कई नाराज़ हो गए
पहले भी
कई और नाराज़
हो जायेंगे आगे भी
अब तक
सर उठा कर जिया हूँ
अब सर झुका कर
कैसे जियूं ?
जो ना कर सका
जीवन में अब तक
बचे हुए दिनों के लिए
कैसे करूँ ?
959-78-15-12-2012
जीवन,मुखोटा,प्रशंसा,खुशामद,सच,झूठ

Wednesday, November 28, 2012

बात ही करते रहोगे



प्यार मोहब्बत की
बात ही करते रहोगे
या कभी प्यार भी करोगे
ईमान भाईचारे के बारे में
लिखते ही रहोगे
या कभी जीवन में भी
उतारोगे
दिल में दर्द लेकर भी
मुस्काराते रहोगे
या कभी हकीकत में
मुस्काराओगे
अब चेहरे पर से
मुखोटा उतार दो
जैसे हो दुनिया को बता दो
तुम्हें तुम्हारा
सत्य पता चल जाएगा
जीने की सही राह
दिखाएगा
जीवन तो सुधर जाएगा
अंत भी सुखद हो जाएगा
875-59-28-11-2012
जीवन,प्यार,मोहब्बत,भाईचारा,मुखोटा,

Tuesday, September 27, 2011

नेपथ्य में …..

नेपथ्य में
चलता है सोच
आती हैं यादें
उमड़ता है प्यार
तंग करती है व्यथा
होती है चिंता
मन में आशंकाएं ,
आकांशाएं 
निरंतर जन्म लेती
फिर लोप हो जाती 
सुख, दुःख से भरी
भावनाएं
मन को घेरे रहती
सामने लगा होता है
मुखौटा
होड़ में स्वयं को
सब से अच्छा बताता
खुशी से भरी  मुस्कान
मन के दुराव को
छुपाती
प्रसाधनों से सजाया
कृत्रिम सौन्दर्य
वस्त्रों की चमक दमक
शरीर पर आभूषण
सम्पन्नता का दिखावा
प्यार भरे बनावटी शब्द
मुंह से निकलते
निश्छल सौम्य चेहरा
मन,ह्रदय और शरीर की
कुरूपता को छुपाता
नेपथ्य को
आगे नहीं आने देता
मन को झूंठी संतुष्टी
प्रदान करता
नेपथ्य में मन
रोता रहता
ना संतुष्ट रहता
ना संतुष्टी के
पथ पर चलता
मुखौटा स्वभाव का 
अटूट अंग

सब को भाता
जीवन के
अंतिम क्षण तक
साथ निभाता
28-09-2011
1575-146-09-11