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Tuesday, September 27, 2011

गुनाह से पहले कातिल ना समझो मुझ को

नज़रें चुराते हो तुम
डर से सहमते हो तुम
निरंतर
बहम से जीते हो तुम
सब को एक नज़र से
देखते हो तुम
कसूर तुम्हारा भी नहीं
कई बार भुगता तुमने
हँस के लुभाया
मुस्कान से भरमाया
लोगो ने
खंजर पीठ में भोंका
लोगो ने
मैं ना कहता तुम
ऐतबार करो मुझ पर
कम से कम निरंतर
शक ना करो मुझ पर
गुनाह से पहले
कातिल ना समझो
मुझ को
इतनी सी दया करो
मुझ पर    
27-09-2011
1569-140-,09-11

Friday, March 18, 2011

दिल-ओ-जान से चाहने वाले,दिल-ऐ-दुश्मन समझे गए




ज़िन्दगी में
दर्द का जलजला आया
जिन्हें बचाने को जान देता
उन्होंने ही कातिल कहा
चेहरा शर्म से झुक गया
यकीन खुद से उठ गया
रोना भी गवारा ना हुआ
अश्क निकलने से पहले ही
सूख गए
वो भी इलज़ाम से घबरा गए
जवाब देते भी नहीं बनता
जहन में मौत का सन्नाटा
कानों में निरंतर उनके
लफ्ज गूंजते
दिल-ऐ-दुश्मन समझे गए
18-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
447—116-03-11