Showing posts with label खुद गर्ज़. Show all posts
Showing posts with label खुद गर्ज़. Show all posts

Wednesday, February 15, 2012

हम खुद गर्ज़ नहीं

कभी ये ना समझना
हम तुम्हें याद नहीं करते
ये बात जुदा है
हाल-ऐ-दिल नहीं बताते
हम तुम्हारे सोये हुए
ज़ज्बातों को
जगाना नहीं चाहते
मोहब्बत की
बुझी हुयी आग को
फिर से
भड़काना नहीं चाहते
हम खुद गर्ज़ नहीं
अपनी हसरतों की
चाहत में
किसी की बसी हुयी
दुनिया उजाड़ दें  
15-02-2012
173-84-02-12

Tuesday, September 27, 2011

मुझे पता है वो छिप कर देख रहे निरंतर

मुझे पता है
वो छिप कर देख रहे
निरंतर
मेरी हरकतों पर
नज़र रख रहे
दिल-ऐ-बेकाबू को
काबू में कर रहे
मन तो
उनका भी होता
दो बात कर लें
हम से
पर घबरा के रह
जाते
निरंतर कदम आगे
बढ़ा कर पीछे
हटते
हम भी क्या करें ?
कैसे समझायें उन्हें ?
क्यों यकीन
नहीं उन्हें खुदा पर ?
क्यूं शक
रखते हर इंसान पर ?
जब तक
चाहे इम्तहान ले लें
यकीन
अपना पक्का कर लें
पर खुद गर्ज़ ना
समझें हम को
27-09-2011
1571-1402-,09-11

Saturday, April 2, 2011

पौधा मोहब्बत का बड़े अरमानों से लगाया

पौधा मोहब्बत का
बड़े अरमानों से लगाया
दिल से सींचा
निरंतर ख्याल उसका रखा
फिर भी उसे खो दिया
अब उन बहारों का क्या करूँ ?
पौधा जिनमें मुरझा गया
दुनिया ने हंसी में उड़ाया

वहीँ नया पौधा लगाने 
 पुराना भूल जाने का
मशविरा दिया
मैं खुद गर्ज़ और बेदर्द नहीं
कब्र पर
नया आशियाना बनाऊँ
वो जगह खाली छोड़ दी
हसरतें दफ़न उस में कर दी
अब यादों के सहारे जीता
सुकून उनमें ढूंढता
02-04--11
580—13 -04-11

Wednesday, March 30, 2011

टूटे दिलों को मिला दे


जो मिला
खुद गर्ज़  मिला
मन भरता,
दिल से निकालता
दिल बार बार तोड़ा
जाता
उम्मीद में जीता जाता
उम्मीद अभी टूटी नहीं
कोई तो होगा
निरंतर जिसने भी
यही भुगता होगा
मेरे जैसे सहता होगा
हाल-ऐ-दिल समझता
होगा
दुआ खुदा से करता
पता उसका बता दे
टूटे दिलों को मिला दे
किश्ती किनारे लगा दे 
मंजिल तक पहुंचा दे
30-03-03
550—220-03-11